Tuesday, December 28, 2021

मेरा कोना।


एक कोना है मेरा भी,
उसका भी, तुम्हारा भी।
जहाँ बैठ कर मेरी क़लम से निकली स्याही,
उससे लिपटे पन्ने से कभी झूठ नहीं कहती।
वो किताब, जिसके रंग की,
दोहराने से उस पर पड़ी उन सिलवटों की,
मेरी आँखों को अनकही एक आदत-सी हो गई है।

दहलीज़ के इस पार मेरा कोना हैं, जहाँ हर शाम मैं इस आस में वापस लौट आता हूँ कि आज अपनी मेज़ पर रखे उस कोरे काग़ज़ पर बिखरी इतिहास की उन झूठी परतों को स्याही में लिपटी अपनी क़लम से साफ़ करूँगा।

________________
15-11-2021
Rahul Khandelwal
 

No comments:

Post a Comment

उपेक्षा

रेत के कण ज़मीन से उठकर हथेली को छूने लगते है अतीत की छुअन वर्तमान में अनुभूति बन जाती है होने वाली सिरहन याद दिलाती है कहती है चीखकर फिर— ...