Wednesday, January 1, 2025

स्मृतियां

 


बैंगनी रंग का लिबास ओढ़े

दिसंबर के आखिरी दिन की स्मृतियाँ 

आती है सालाना

दरवाज़े की सीढ़ियों तक


स्मृतियाँ नहीं देती हैं दस्तक

साथ आई लिबास में लिपटी गंध

कराती है बोध मुझे उनके आने का


मैं भरोसा रख किवाड़ खोल देता हूँ 

जैसे खोला था स्व को उसके सामने तब

वास्तविक रूप में बिना झिझके

सभी ताकतों और कमज़ोरियों के साथ


नए साल की सुबह सालाना स्मृतियाँ 

बिस्तर से उठ बिन किसी आहट के

धूप की किरणों से व्याप्त कमरे के फर्श से होते हुए

लौट जाती है एक बार

फिर से आने के लिए


छोड़ जाती हैं पीछे बस

चादर की सिलवटों में अपनी गंध

अगले साल तक के लिए

जैसे छोड़ गई थी कुछ तब

सदा के लिए


एहसास गंध का

सिर्फ़ चादर में ही नहीं बचा रहता

बनी रहती है याद उसकी

स्मृतियों में भी निरंतर

___________________

01-01-2025

Rahul Khandelwal 


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