काश हम समझ पाते कि मनुष्यों द्वारा निर्मित धार्मिक उन्माद जिसके अस्तित्व और स्वरूप का आधार कृत्रिम है, उसके तले दुबका-कुचला इंसान आज मानवता, प्रेम और सद्भाव की छांव तले पनाह की गुहार लगा रहा है। काश।
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01-08-2023
Rahul Khandelwal
A Creative Writing Page -Rahul Khandelwal | मेरा अनुभव ही मेरा जीवन है और मेरे हर लेखन में ये दर्ज है।
रेत के कण ज़मीन से उठकर हथेली को छूने लगते है अतीत की छुअन वर्तमान में अनुभूति बन जाती है होने वाली सिरहन याद दिलाती है कहती है चीखकर फिर— ...
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