Saturday, September 27, 2025

लेखकीय धर्म


लिखो, जो करते हो महसूस

लिखो स्वानुभवों को भी

लिखो अपनी सभी अनुभूतियां

क्योंकि मनुष्य के लिए प्रकृति के खिलाफ होना

छलना है ख़ुद को

अछूता नहीं हैं लेखक भी इससे


जिसका तुमने अवलोकन किया

जो रह गया सिर्फ़ स्वप्नों में ही कैद

उसे भी लिखो बिन किसी शर्त के

जैसे माँ करती है अपने शिशु से प्यार


पहचानों समकालीन विचारों को

मत मूंदो आँखें मानवीय स्थितियों से

दायित्व है तुम्हारे ये सभी

इन्हें दर्ज करो, लिखो


अतीत, वर्तमान, भविष्य को लिखो

लिखो जो समय से परे भी हो—तुम्हारी कल्पनाएं और ब्रह्माण्ड

सत्य का अंश जिसका, तुम्हारा अपना भी है

धर्म हैं तुम्हारे ये, तुम इनसे मुख नहीं मोड़ सकते


आत्म लिखो, लिखो ब्रह्मन् भी

'लेखकीय धर्म' है ये सभी

यही 'सत्य' है लेखक होने का

___________________
26-09-2025
Rahul Khandelwal 

विस्मृति मृत्यु नहीं, "मैं" की हत्या है


निजि सम्पत्ति का हिस्सा बने रहने दो

अपने अतीत के अवशेषों को

मिल्कियत रहे इनकी सिर्फ़ तुम तक

मत होने दो तबाह इन्हें

कि नींव में की गई तब्दीली मकान को ढ़हा सकती है

जैसे नहीं बच पाते पेड़ के पत्ते हरे, जड़ से विच्छेद होने के बाद

 

"तब्दील न हो जाए स्मृति विस्मृति में"-

चिल्लाता हुआ दौड़ा चला जा रहा है अतीत

अमानवीय होती गई मनुष्य की सभ्यताओं के बीच

कारण उसकी गुहार भरी चीख को अनसुना करना है

नज़र अंदाज़ करना तुम्हारे 'मैं' को भीतर से खोखला कर देगा

यह मृत्यु नहीं, खामोश हत्या होगी

___________________

01.09.2025

Rahul Khandelwal

अनुत्तरित

ईश्वर मनुष्यों में निवास करता है सो मैं खोलता रहा अपनी तहें  आँखें झुकाकर तुम सुनती रही जैसे सुनती है धरा बारिश को ऐसी व्यंजनाएँ रिश्तों में...