Wednesday, January 24, 2024

क्या लफ्ज़ों में सबकुछ बयां करने की क्षमता होती है?


क्यों संवेदनाएं व्यक्त करने के लिए, खोजने से भी शब्द नहीं मिलते? ऐसी परिस्थितियों की ख्वाइश कोई नहीं करना चाहता कि संवेदनाएं (शोक) व्यक्त की जाएं। लेकिन क्या हम जीवन के इस सत्य से भाग सकते है कि इसका अंत निश्चित है?

तो जब कभी मेरा, ऐसे किसी भी मौके से वास्ता पड़ता है, मेरी कलम मेरा साथ कभी नहीं देती। मैं चाहकर भी कुछ लिख नहीं पाता। उन क्षणों में ऐसा लगता है कि मेरे पास बहुत कुछ लिखने-कहने को तो है, लेकिन उसे लिखा और कहा नहीं जा सकता। मानो मैंने सब कुछ लिख दिया हो और लिखकर मिटा दिया हो।

कभी-कभी लिखकर मिटा देना भी 'लिखना' जैसा होता है। संवेदनाओं से भरी भावनाएं व्यक्त करने के लिए हर बार लफ़्ज़ साथ दे, ऐसा ज़रूरी नहीं। तब मैं उन तमाम शख़्स से बस इतना ही कह पाता हूं कि मैं उनके लिए दुआ करता हूं कि उनसे जुड़े उनके अपनों की सभी यादें हमेशा उनके साथ रहें।

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24-01-2024

Rahul Khandelwal

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