"सार्वभौमिक सत्य की तलाश में अंतहीन यात्रा
कामयाब होने का दावा इसे खोखला कर देगा"
गर जो गौर से देखो
तो सीमित नहीं है नज़र तुम्हारी
स्त्रोत हो तुम उन सभी अनुभूतियों का
जो सबके हिस्ते आती हैं
बशर्ते
कि तुम सहानुभूति रख सकने की मानवीय प्रवृत्ति को
ख़त्म न होने दो
'दुःख' एक का होकर भी
सिर्फ़ उसका ही नहीं रहता
साझा हो जाती है मिल्कियत उसकी
पीड़ाओं को रिसने दो
आंसुओं से पवित्र कुछ नहीं संसार में
दुःख की अनुभूतियों में
सार्वभौमिक सत्य की ओर ले चलने की क्षमता होती हैं
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03.01.2026
Rahul Khandelwal

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