Saturday, December 6, 2025

दुःख और डर

"प्रिय निर्मल वर्मा,

ऐसा नहीं है कि दुःख में डर नहीं होता या सिर्फ़ सुख ही डर से घिरा होता है। कई बार पीड़ाएँ और दुःख के समय हमारे अंश की ऐसी छायाएँ उभर आती हैं जिनकी जड़ें हमारे भीतर खोजने पर भी नहीं मिलतीं। इंसान चीख सकता है कि उसे उसका अपना साथ कैसे एक मुजरिम जान पड़ रहा है, लेकिन समय के उस अंतराल में ये सब व्यर्थ है। ऐसे में उन छायाओं का होना और अपनी असल छायाओं की तलाश में तड़पना भी डर को जन्म देता है। हम यकीन नहीं कर पाते कि हमारे वे हिस्से हमसे अलग कैसे हुए।

अपने सबसे प्रिय को मृत्यु से लड़ता देख मन के घोर अंधेरे में पीड़ाएँ भाप की तरह ऊपर उठ आती हैं। तब न चाहते हुए भी डर का प्रकोप आपके काँपते हुए हाथों को त्वरित ही वंदना के लिए जोड़ने पर मजबूर कर देता है—यह जानते हुए भी कि मृत्यु जीवन का पहला और अंतिम सत्य है।

मैंने दुःख और डर को साथ निवास करते देखा है।"

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06-12-2025

Rahul Khandelwal 

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