Sunday, January 4, 2026

'सवाल-जवाब' प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल के साथ

A memory: One with the Professor.

I got an opportunity to talk with Prof. Purushottam Agrawal during an interactive session after the lecture. Here's a portion of the Q&A session in the form of my questions followed by insightful answers given by sir.

(1)

राहुल खंडेलवाल: धर्म और विवेक के हवाले से एक प्रश्न। एक तरफ़ हम देखते है कि गांधी एक धार्मिक व्यक्ति थे और दूसरी तरफ हम गांधी के उस पहलू को भी देखते है जिसमें हम याद करते है उस किस्से को जब उनसे पूछा जाता है कि “Where is your highest seat of authority?” And to this particular question, Gandhiji puts his hand on his chest and says it lies here. Here, Gandhi talks about the significance of one’s own ‘vivek.’ While saying this and considering the popular understanding of ‘dharma’ as such (whose English translation is religion), I find a sort of contradiction here.

मैं ये पूछना चाहता हूँ कि गांधीजी का ये कहना किस पर निर्भर करता है? क्या ये इस बात पर निर्भर करता है कि आपके लिए धर्म (as such) का क्या अर्थ हैं और आपका ख़ुद का (व्यक्तिगत तौर पर) किस धर्म (‘religion’ in general) से संबंध हैं?

प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल: ‘धर्म’ और ‘ईश्वर में विश्वास’ का कोई अनिवार्य संबंध नहीं है। भारतीय परंपरा में कम से कम दो धर्म ऐसे है जो ईश्वर पर विश्वास नहीं करते—बौद्ध और जैन। लेकिन दोनों का अपना धार्मिक धर्मशास्त्र है, धार्मिक तंत्र–मंत्र है, रीति–रिवाज़ है और पाखंड भी है जैसा कि किसी भी संगठित धर्म में समय के साथ जुड़ जाता है। तो ऐसा नहीं है कि अगर आप धर्म को मानते हैं तो इश्वर को मानेंगे ही मानेंगे या इश्वर को मानते हैं तो धर्म को मानेंगे। गांधी जी ये मानते थे कि सभी धर्म ईश्वर के भेजे हुए है, ईश्वरीय है, प्रकटीकरण है। लेकिन इश्वर की वाणी उन तक आती है दोहरे फिल्टर के बाद [एक फिल्टर है—अवतार का, पैगंबर का, मसीहा का (गीता के संदर्भ में कृष्ण, कुरान के संदर्भ में मोहम्मद और बाइबल के संदर्भ में ईसा का), दूसरा फिल्टर व्याख्याकार लगाते है क्योंकि हर धर्म में अवतार, पैगंबर या ईसा के बाद कई तरह की व्याख्याएं होती है]। इसीलिए किसी भी धर्मशास्त्र में ईश्वर की वाणी हमें शुद्ध रूप से प्राप्त नहीं होती, छन कर प्राप्त होती है। सभी धर्म इश्वर प्रेरित है लेकिन सभी धर्म इस तरह फिल्टर्ड है।

दूसरा यह कि दुनिया में इतने धर्म इसलिए हैं क्योंकि सभी धर्म अपूर्ण हैं (imperfect है)। इसलिए पर्फेक्शन हमें खोजना होगा और पर्फेक्शन खोजने के लिए हमें विवेक का निर्माण करना होगा (उस पर भरोसा करना होगा) और विवेक किससे बनेगा? केवल मेरी परंपरा से नहीं बनेगा। गाँधी जी की अपनी परंपरा वैष्णव परंपरा थी, उनकी माता की तरफ़ से जैन परंपरा थी और प्रणामी संप्रदाएं से भी वे प्रभावित थी। गांधीजी की इस्लामी परंपरा और ईसाई परंपरा नहीं थी लेकिन वे सबसे प्रेरणा लेते थे। तो कोई कंट्राडिक्शन नहीं है इसमें। जब गाँधी कहते हैं कि मैं किसी भी धर्म को, किसी भी धर्मादेश को नैतिक मूल्यांकन के बाद ही स्वीकार करूंगा और उसका प्रतिमान उन्होंने घोषित कर रखा था ईशावास्योपनिषद का पहला मंत्र—

“तेनत्येक्तेन भुञ्जीथा मा गृध: कस्य स्विद्धनम॥”

दुनिया में जो कुछ है सब तुम्हारा है पर केवल तुम्हारा नहीं है। इसलिए उसका उपभोग करो और दूसरों का ख़्याल रखों। उन्हें एतराज भी नहीं था कि आप ईश्वर को नहीं मानते। उन्होंने ईश्वर विरोधियों के विरुद्ध कोई लंबे-चौड़े लेख नहीं लिखे थे, कुछ जगहों पर नास्तिकता पर टिप्पणियां की है। आप मेरी पुस्तक में देखेंगे कि गांधीजी के जीवन का सबसे शानदार संवादों में से एक संवाद उनका एक नास्तिक के साथ हुआ संवाद है (जो घोषित रूप से ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते थे) और बाद में गांधीजी और उनके बीच में काफी रोचक संबंध विकसित हुए। ‘आस्था’ by definition तथ्य के परे होती है, इसलिए हम उसे क्यों साबित करें।

SAHMAT Public Lecture Series organized a lecture on the topic
“Gandhi’s Last Fast” delivered by Prof. Purushottam Agrawal on 03.01.2025

(2)

राहुल खंडेलवाल: नैतिकता और उसमें आए हुए बदलावों का भी अपना इतिहास हो सकता है। नैतिकता में जो बदलाव आते है, सकारात्मक या नकारात्मक (भाव के रूप में एक उदाहरण आपने भी रेखांकित किया कि जब व्यक्ति ज़िम्मेदारी लेना छोड़ देता है और दूसरा, जिसे व्यक्तिगत रूप से मनुष्यों के सबसे बड़े दुर्गुणों में से एक को आप मानते है—कृतघ्नता)—क्या इसका कारण ऐतिहासिक कारकों (historical forces) में आए हुए बदलावों पर निर्भर करता है या इसका संबंध वैयक्तिक तौर पर मानवीय प्रवृत्तियों से भी है?

प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल: निश्चित रूप से नैतिकता ऐतिहासिक रूप से बदलती है। नैतिकता में शब्द वही रहते हैं, अर्थ बदल जाते हैं। ग्रीक फिलोसॉफिकल ट्रेडिशन में गुलामों का होना जस्टिस का खंडन नहीं है, औरतों में अक्ल नहीं होती—यह मान्यता उन्हें जस्टिस के विरुद्ध नहीं लगती है। तो शब्द वही है ‘जस्टिस’ लेकिन अर्थ आप देखिए। तो आप अगर पूरी मानवीय चिंतन परंपरा को देखें—ग्रीक, भारत, बेबीलोन, चीन या कहीं भी—तो नैतिकता भौतिक स्थितियों में बदलाव के कारण बदलती है। नैतिकता भी बदलती है और आपका मन भी बदलता है। अब इस बात को बकायदा रिकॉगनाइज किया जाने लगा है कि आई.टी. रिवोल्यूशन से पहले भी समाज में मानसिक व्याधियाँ थी लेकिन आई.टी. रिवोल्यूशन के बाद मानसिक व्याधियों में तेज़ी से वृद्धि हुई हैं और आई.टी. रिवोल्यूशन एक भौतिक परिवर्तन है। किसी भी बात पर विचार करने से पहले (चाहे नैतिकता पर करें या मनोविज्ञान पर), भौतिक संदर्भों (material context) को आप इग्नोर नहीं कर सकते। You cannot afford to ignore the evolution in terms of material and historical forces.


(3)

Due to the paucity of time, I could not ask this question which I am mentioning here:

राहुल खंडेलवाल: ऐतिहासिक कारक बदलते हुए समय के साथ बदलते है। किसी व्यक्ति द्वारा जाने, अनजाने, या प्राकृतिक रूप से इजात किया गया दर्शन भी इसी पर एक सीमा तक निर्भर करता है। किसी ख़ास दौर में पैदा हुए दर्शन (गांधीजी को ध्यान में रखते हुए) को हम किसी दूसरे समय (अपने मौजूदा समय) में किस हद तक लागू कर सकते है?

दूसरा, आपने कहा कि विवेक को बनाने के लिए आंतरिक नैतिक मूल्यों के अलावा भी हमें समग्रता में (जिसमें सिर्फ़ किसी एक राष्ट्र की सीमाएं नहीं होंगी) और इतिहास, दोनों से मदद लेने की ज़रूरत है। इसी से जुड़ता हुआ प्रश्न जो मैं कई बार सोचता हूँ कि अपने समय और संबंधित संदर्भों में तैयार किए गए विवेक के आधार पर किसी दूसरे समय और उसमें मौजूद मनुष्यों के कृत्यों का मूल्यांकन करना कितना हद तक उचित है? चीनी लेखक, इतिहासकार और दार्शनिक लू ज़िक़िआन का कहना है कि इतिहास के किसी दौर को समझने के लिए ख़ुद को उस काल में—तत्कालीन गुण और दोष के साथ—पिक्चराइज करिए और तब फैसला लीजिए कि क्या करना है।

Note: हमेशा की तरह हासिल के रूप में लेक्चर से निकली कोई सीख या पाठ:
“Follow your ‘vivek.’ Follow only your conscience.”
—Prof. Purushottam Agrawal

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03.01.2026
Rahul Khandelwal

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