Friday, April 17, 2026

अनुत्तरित

ईश्वर मनुष्यों में निवास करता है
सो मैं खोलता रहा अपनी तहें 
आँखें झुकाकर तुम सुनती रही
जैसे सुनती है धरा बारिश को
ऐसी व्यंजनाएँ रिश्तों में विश्वास को जन्म देती है
भ्रम का सवाल कैसे ही उठ सकता था वहाँ?

मृगतृष्णा दूरी की द्योतक होती है 
बाती को लगा कि वो दिये के भीतर है
लेकिन अपना सुराख सिर्फ़ दिया ही जानता था

शायद अपरिपक्वता का दोष था ये
जो मैं अनजान बना रहा
कि शरीर के घोर अंधेरें में छिपी दमित इच्छाएँ भी
मानवीय क्रियाओं को प्रभावित कर सकती है

मैं परेशान हुआ
उससे कहीं अधिक असमंजस में था
कि तुम्हारी इच्छाएँ बाहरी कारक के चलते जन्मी थी
या कि थी नैसर्गिक?

बाती छल की हकदार नहीं हो सकती थी
बाती को उसकी लौ के बुझने का कारण कौन बताएगा?
___________________
13.04.2026
Rahul Khandelwal

The Unfulfilled

How many more poems I could steal from you?
I am tired now.
Memories in the treasury start fading.
Have been protecting them
from becoming dead for the last six years.
Nevertheless, this struggle never knocks at your door.
Ocean never knows the cries of the seabed.
Alas! I feel sad,
as memories continuously heading towards death.

Breathing gets heavier while remembering you.
Never come for me
but come for the sake of memories
as here on the Earth
these are signs of humans' existence.

Long live time!
Long live space!
And long live memories!

My desire for your touch
can save the lives of the memories.
And your arrival?
It can bloom the flowers in the treasury.

Prayers!
___________________
11.04.2026
Rahul Khandelwal

अधूरी आस

तुमसे और कितनी कविताएँ चुरा सकता था मैं
मैं थक चुका हूँ 
कोष की स्मृतियाँ अब सूख चुकी है
पिछले छः सालों से इन्हें निर्जीव होने से बचा रहा हूँ
इस संघर्ष ने तुम्हारे दरवाज़े पर कभी दस्तक नहीं दी
समुद्र नहीं जान पाता तल का रुदन
दुःख होता है इन्हें मृत्यु की ओर बढ़ता देख
स्मरण के समय साँस लेने पर
अब भारीपन महसूस होने लगा है

मेरे लिए मत आना
आना तो सिर्फ़ यादों के लिए
पृथ्वी पर स्मृतियाँ अस्तित्व की पहचान होती है

बचा रहे समय
बचा रहे स्थान
और बची रहें स्मृतियाँ 

तुम्हारे स्पर्श की कामना स्मृतियों का जीवन बचा सकती है
तुम्हारा आगमन कोष में फूल खिला सकता है

प्रार्थना!
___________________
11.04.2026
Rahul Khandelwal

अनुत्तरित

ईश्वर मनुष्यों में निवास करता है सो मैं खोलता रहा अपनी तहें  आँखें झुकाकर तुम सुनती रही जैसे सुनती है धरा बारिश को ऐसी व्यंजनाएँ रिश्तों में...