Friday, April 17, 2026

अनुत्तरित

ईश्वर मनुष्यों में निवास करता है
सो मैं खोलता रहा अपनी तहें 
आँखें झुकाकर तुम सुनती रही
जैसे सुनती है धरा बारिश को
ऐसी व्यंजनाएँ रिश्तों में विश्वास को जन्म देती है
भ्रम का सवाल कैसे ही उठ सकता था वहाँ?

मृगतृष्णा दूरी की द्योतक होती है 
बाती को लगा कि वो दिये के भीतर है
लेकिन अपना सुराख सिर्फ़ दिया ही जानता था

शायद अपरिपक्वता का दोष था ये
जो मैं अनजान बना रहा
कि शरीर के घोर अंधेरें में छिपी दमित इच्छाएँ भी
मानवीय क्रियाओं को प्रभावित कर सकती है

मैं परेशान हुआ
उससे कहीं अधिक असमंजस में था
कि तुम्हारी इच्छाएँ बाहरी कारक के चलते जन्मी थी
या कि थी नैसर्गिक?

बाती छल की हकदार नहीं हो सकती थी
बाती को उसकी लौ के बुझने का कारण कौन बताएगा?
___________________
13.04.2026
Rahul Khandelwal

No comments:

Post a Comment

अनुत्तरित

ईश्वर मनुष्यों में निवास करता है सो मैं खोलता रहा अपनी तहें  आँखें झुकाकर तुम सुनती रही जैसे सुनती है धरा बारिश को ऐसी व्यंजनाएँ रिश्तों में...