सो मैं खोलता रहा अपनी तहें
आँखें झुकाकर तुम सुनती रही
जैसे सुनती है धरा बारिश को
ऐसी व्यंजनाएँ रिश्तों में विश्वास को जन्म देती है
भ्रम का सवाल कैसे ही उठ सकता था वहाँ?
मृगतृष्णा दूरी की द्योतक होती है
बाती को लगा कि वो दिये के भीतर है
लेकिन अपना सुराख सिर्फ़ दिया ही जानता था
शायद अपरिपक्वता का दोष था ये
जो मैं अनजान बना रहा
कि शरीर के घोर अंधेरें में छिपी दमित इच्छाएँ भी
मानवीय क्रियाओं को प्रभावित कर सकती है
मैं परेशान हुआ
उससे कहीं अधिक असमंजस में था
कि तुम्हारी इच्छाएँ बाहरी कारक के चलते जन्मी थी
या कि थी नैसर्गिक?
बाती छल की हकदार नहीं हो सकती थी
बाती को उसकी लौ के बुझने का कारण कौन बताएगा?
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13.04.2026
Rahul Khandelwal
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