Thursday, March 19, 2026


'स्व' की खोज का रास्ता विरला होता है—भीड़ कम और डर अधिक, शायद। समय घड़ी के सैकड़ों चक्कर काट चुकी होती है—इसमें व्यर्थता हरगिज़ नहीं होती और हो भी कैसे सकती है (यह लांछन लगाना भी दूसरों को लीक से परे हट कर चलने और सोचने से रोक सकता है), बल्कि यह उसके बीत गए अतीत की जमा पूंजी भर हो सकती है।

उसे ध्यान था कि रात के अंधेरे में चल रहीं गाड़ियाँ सड़क के किनारे फुटपाथ पर बैठे उसके एकाकीपन का ध्यान नहीं भटका सकेंगी। तलाश पूरी हो ही चुकी थी कि तत्कालीन परिस्थितयाँ उसकी इजाज़त के साथ 'स्व' पर हावी होती चली गई (क्या उसने इजाज़त दी थी? यह सवाल आज तक उसके लिए अनबुझी पहेली बना हुआ है)। 'स्व की स्वतंत्र एजेंसी' और 'अवस्थाओं की क्षमता' के बीच के अंतर्द्वंद्व का सवाल आज भी उसका पीछा कर रहा है जिसका विश्लेषण करते हुए उसे पिछले छः बरस बीत चुके है। पता नहीं और कितने बीतेंगे?

हम कई बार ऐसी स्थितियों से गुज़रते है कि बाहरी कारकों को इजाज़त देने और नहीं देने के बीच के फ़र्क को आखिर तक भी समझ नहीं पाते? जटिलताएँ छोरों पर जाकर सुकून नहीं पाती और ना ही उत्तर। उनके जवाब की तलाश का रास्ता महीनताओं से होकर गुज़रता है। क्या इंसान उन ग्रे एरियाज़ में से अंतिम तह को हटा सच की तलाश कर पाने में कभी कामयाब हो भी पाता है?

रेत के कण ज़मीन से उठकर
हथेली को छूने लगते है
अतीत की छुअन
वर्तमान में अनुभूति बन जाती है
होने वाली सिरहन याद दिलाती है
कहती है चीखकर फिर—
"प्रभावहीन रहने देना कारकों को
बेअसर रहें वे सभी
और बची रहे काया की निश्च्छलता
नहीं तो कर दिए जाओगे
अपने ही घर से बेघर"

रेत अब भी निरंतर फिसल रही है
उठने वाले कण अब भी चीख रहे है
किया जा रहा है आज भी उन्हें अनसुना

मनुष्य मर रहा है
जज सज़ा सुना चुका है
पाप को फांसी दी जा चुकी है
असल हत्यारे—'पश्चाताप' को
रेत के साथ ज़मीन में एक बार फिर दफ़न कर दिया गया है
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16.03.2026
Rahul Khandelwal

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