रेत के कण ज़मीन से उठकर
हथेली को छूने लगते है
अतीत की छुअन
वर्तमान में अनुभूति बन जाती है
होने वाली सिरहन याद दिलाती है
कहती है चीखकर फिर—
"प्रभावहीन रहने देना कारकों को
बेअसर रहें वे सभी
और बची रहे काया की निश्च्छलता
नहीं तो कर दिए जाओगे
अपने ही घर से बेघर"
रेत अब भी निरंतर फिसल रही है
उठने वाले कण अब भी चीख रहे है
किया जा रहा है आज भी उन्हें अनसुना
मनुष्य मर रहा है
जज सज़ा सुना चुका है
पाप को फांसी दी जा चुकी है
असल हत्यारे—'पश्चाताप' को
रेत के साथ ज़मीन में एक बार फिर दफ़न कर दिया गया है
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16.03.2026
Rahul Khandelwal
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