Friday, April 17, 2026

अधूरी आस

तुमसे और कितनी कविताएँ चुरा सकता था मैं
मैं थक चुका हूँ 
कोष की स्मृतियाँ अब सूख चुकी है
पिछले छः सालों से इन्हें निर्जीव होने से बचा रहा हूँ
इस संघर्ष ने तुम्हारे दरवाज़े पर कभी दस्तक नहीं दी
समुद्र नहीं जान पाता तल का रुदन
दुःख होता है इन्हें मृत्यु की ओर बढ़ता देख
स्मरण के समय साँस लेने पर
अब भारीपन महसूस होने लगा है

मेरे लिए मत आना
आना तो सिर्फ़ यादों के लिए
पृथ्वी पर स्मृतियाँ अस्तित्व की पहचान होती है

बचा रहे समय
बचा रहे स्थान
और बची रहें स्मृतियाँ 

तुम्हारे स्पर्श की कामना स्मृतियों का जीवन बचा सकती है
तुम्हारा आगमन कोष में फूल खिला सकता है

प्रार्थना!
___________________
11.04.2026
Rahul Khandelwal

No comments:

Post a Comment

अनुत्तरित

ईश्वर मनुष्यों में निवास करता है सो मैं खोलता रहा अपनी तहें  आँखें झुकाकर तुम सुनती रही जैसे सुनती है धरा बारिश को ऐसी व्यंजनाएँ रिश्तों में...