Thursday, March 14, 2024

मधु कांकरिया जी की कहानी "जगह खाली है" पर एक टिप्पणी।


हंस कथा मासिक के मार्च अंक में प्रकाशित मधु कांकरिया जी की कहानी "जगह खाली है" को पढ़ा आज। कहानी को कहने और लिखने के जिस अंदाज़ को आप अख़्तियार करती है, ऐसा लगता है मानो इंसान ख़ुद ही ख़ुद से संवाद करता चला जा रहा है। कई जगहों पर ऐसे वाक्य पढ़ने को मिलते है जो मानवीय व्यवहार से जुड़े दर्शन और सच्चाई को आपके सामने लाकर रख देते है। कुछ घटनाओं के चलते जिनका प्रत्यक्ष रूप से कई बार हमारा कोई संबंध भी नहीं होता, उनमें फंसकर इंसान अनिच्छापूर्वक अपनी अवस्था को छोड़ दूसरी अवस्थाओं में प्रवेश करने पर मजबूर हो जाता है, तो मालूम पड़ता है कि ज़िंदगी का कितना थोड़ा भाग उसने अभी देखा है और उन तमाम दूसरी अवस्थाओं में दाख़िल होने के बाद वहां मौजूद समस्याओं और भेदभाव को देख वो ख़ुद को कितना असहाय महसूस करता है, इसके बारे में भी यह कहानी पढ़कर पता चलता है।

सत्ताधीशों द्वारा बनाए गए नियमों और कानूनों का दुरुपयोग कभी-कभी इंसान के मस्तिष्क की सोच और संभावनाओं से दूर निवास कर रहे एक प्रकार की साज़िश का रूप ग्रहण कर उसके खिलाफ किया जा सकता है, उनकी कहानी पढ़कर यह भी मालूम पड़ता है।

इंसान की स्मृतियां कभी उसका साथ नहीं छोड़ती है। आप स्मृतियों को लांघ कर कोसों दूर निकल आते है, एक लंबा सफ़र तय करने पर भी स्मृतियों के कुछ अवशेष आपकी परछाई बनकर आपका पीछा कभी नहीं छोड़ते, अंतिम सांस तक भी नहीं। इंसान के लिए गुज़रे हुए अतीत में कुछ घटनाओं की छांप और जड़े इतनी गहरी होती है कि वो गुज़र रहे (मौजूदा) समय में आपकी बिना इजाज़त लिए कभी-भी आपके वर्तमान के दरवाज़े पर दस्तक देती है, आपके मन और मस्तिष्क में प्रवेश करती है और आपकी तमाम कोशिशों के बाद भी बीतती नहीं। सिवाए इसके कि आप बिना किसी दूसरे विकल्प के, बेबस और मजबूर होकर उन अनुभूतियों को महसूस करने के लिए सिर्फ़ बाध्य हो सकते है, और कुछ नहीं। मुझे लगता है कि स्मृतियाँ, बारिश के बाद मिट्टी में जन्म लेने वाली अवांछित जड़ें जैसी होती है जिसके ना बीज बोयें जाते है, ना उनमें पानी दिया जाता है और ना खाद डाली जाती है। अतीत गुज़र जाता है लेकिन कुछ अधूरी रह गई ख्वाइशें, अनकिया को करने की इच्छाएं, इंसान को उसका शेष जीवन त्यागने की इजाज़त नहीं देती। लेकिन सवाल ये आ जाता है कि क्या हर किसी को यह मौका मिल पाता है? कहानी पढ़कर यह सब के बारे में भी पता लगता है।

आपने मनुष्य व्यवहार की अलग-अलग परतों को उतार, नीचे उसके भीतर, निवास कर रहे अलग-अलग मनुष्यों को दिखाने का प्रयास किया है जो प्रेम, सुख, दुःख, पीड़ा, पछतावा, शैतान से भरे ख्यालों और इन सब उलझनों को सुलझाने की जद्दोजहद में लगा रहता है।

शुक्रिया ये कहानी लिखने के लिए।

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14-03-2024

Rahul Khandelwal 

Thursday, March 7, 2024

क्या तुम्हें ख़ुद से डर नहीं लगता?



अब उन सभी की आंखों ने

आंसू बहाना बंद कर दिया है

यह सब कितना असामान्य है

कि हार रही मनुष्यता को देख

सभी चैन की नींद कैसे सो पाते है?


क्या तुम सो पाओगे चैन से

गर तुमको जान पड़े कि

कई माएं खो चुकी है

अपनी बेकसूर संतानों को?


और यह सब जान कर भी

अब तुम्हारी ख़ुद की आंखों ने भी

आंसू बहाना बंद कर दिया है।

जवाब दो, क्या ख़ुद में होते हुए

इस बदलाव को देखकर भी

तुम्हें ख़ुद से डर नहीं लगता?


क्या तुम्हें डर नहीं लगता यह सब सोच कर भी

कि ख़ुद के सामने तुम देख रहे हो

असामान्य को सामान्य में तब्दील होते हुए?


बोलो, इतने बेबस और बुज़दिल कैसे हुए तुम?

जवाब दो।

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07-03-24

Rahul Khandelwal

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Published in "KRITYA Poetry Journals." Click on this link and scroll down to the bottom.


Note: This poem is dedicated to all the innocent children who have died so far in the Israel-Palestine conflict.


Saturday, March 2, 2024

स्मृतियाँ, बारिश के बाद मिट्टी में जन्म लेने वाली अवांछित जड़ें जैसी होती है।


"कभी-कभी ऐसा लगता है कि समय का एक बहुत बड़ा अंतराल गुज़रकर भी ठहरा हुआ है। क्या इंसान के लिए कहीं किसी दूर स्थित अतीत की स्मृतियों को लांघ पाना संभव है, क्या हम कभी-भी उभर पाते है उनसे?

ये सब अवचेतना की बनने की प्रक्रिया का कब हिस्सा बनता चला जाता है कि हमें मालूम भी नहीं पड़ता कि कब हमारी अंतरात्मा एक प्रकार से कोष का रूप धारण कर लेती है उन सभी स्मृतियों के लिए, जिनका हाथ हम ये मानकर बहुत पहले छोड़ आए थे कहीं कि उनकी छाया हमारा पीछा कभी नहीं करेंगी। और आपको उनके होने का एहसास तब होता है, जब वो सभी स्मृतियां आपके अवचेतन मन से निकलकर समय-समय पर चेतना का हिस्सा बन आपके जीवन के गुज़रते हुए समय की चौखट पर दस्तक देती है।

मुझे लगता है- स्मृतियाँ, बारिश के बाद मिट्टी में जन्म लेने वाली अवांछित जड़ें जैसी होती है जिसके ना बीज बोयें जाते है, ना उनमें पानी दिया जाता है और ना खाद डाली जाती है।"
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02-03-24
Rahul Khandelwal 

Wednesday, February 21, 2024

अविनाशी अंतरात्मा



आपकी अंतरात्मा के अस्तित्व का संबंध आपके जीवन से है, विध्वंसता से नहीं।


उन्होंने कई शहर तबाह किए

नहीं बख्शा हर उम्र के बेकसूरों को भी

मलबे में तब्दील कर दी गई

कई इमारतें और इबादत के स्थल


लेकिन नहीं विध्वंस कर पाई उनकी नफ़रत

मेरी अविनाशी अंतरात्मा और आस्था को

जिसके अस्तित्व का संबंध मेरे जीवन से है

उनके अहंकार से नहीं

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01-02-2024

Rahul Khandelwal 

हिंद रजब


हिंद रजब का डरना प्राकृतिक था

उस हर एक दूसरे व्यक्ति की तरह ही

जो गर उन परिस्थितियों में होता

तो डर का ही चुनाव करता बिना झिझके


उसकी मदद से भरी गुहार और आवाज़ को सुनने के बावजूद

अपने हित के खो जाने के डर की वजह से मदद ना करना

चारों ओर गूंजती पुकार को अनसुना कर फिरसे डरना

किसी भी रूप में प्राकृतिक तो नहीं था


हम खो रहे है हर दिन

अंतःकरण से आने वाली आवाज़ को सुनने की क्षमता

कि घटनाओं के पीछे छिपे संदर्भ असल है या नकली

और कौनसे कारक प्राकृतिक है और कौनसे कृत्रिम

इन्हें पहचानने की दृष्टि अब हममें शेष नहीं


मौजूदा समय की स्थियियां इस बात की गवाह है

कि इंसान गुज़रते हुए समय के साथ बुज़दिल हो रहा है

कि उसके लिए अब सही और गलत का निर्णय

सिर्फ उसके हित और अहित पर निर्भर करता है

असल में क्या सही है और क्या गलत

क्या सत्य है और क्या असत्य, इस पर नहीं


दुखद है ये कि क्षीण हो रही है क्षमता

अंतःकरण को सुनने की

वंचित हो रहा है मनुष्य

अपनी ही अंतरात्मा की आवाज़ से

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21-02-2024

Rahul Khandelwal

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Published in "KRITYA Poetry Journals." Click on this link and scroll down to the bottom.


Note: This poem is dedicated to six years old Hind Rajab who lost her life during Israel-Palestine conflict.

Friday, February 9, 2024

क्या आपकी चेतना का निर्माण आप स्वयं करते है?


क्या आपने कभी उन कारकों पर ध्यान दिया है जिनकी वजह से आपकी चेतना का निर्माण होता है और तत्पश्चात् आप विभिन्न विषयों पर अपनी राय व्यक्त करते है और अलग-अलग विकल्पों के बीच से किसी एक का चुनाव करते है?

"बाहरी और भीतरी 'मैं' के बीच के वाद-विवाद की उलझनों में फंसा मनुष्य क्या इस अनंत काल तक चलने वाली प्रक्रिया से बाहर आ सकता है कभी? एक व्यवहारिकरण पर ज़ोर देता है, तो दूसरा इस कृत्रिम व्यवहार के बीच व्याप्त 'सत्य' और 'असलियत' की ओर चलने को बाध्य करता है। क्या इन दोनों के बीच की बहस में से, हम असल की पहचान का चुनाव कर पाएंगे कभी? या हम अभिनय करने के इतने आदी हो गए है कि असल को जानते हुए भी नकार देना चाहते है उस 'सत्य' को, जिसकी समाप्ति के लिए हम हर दिन कृत्रिमताओं पर आधारित अनावश्यक संघर्ष करते चले जा रहे है?"

यह एक ऐसी रणभूमि है, जो सदैव अदृश्य रहती है।

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09-02-2024

Rahul Khandelwal 

Thursday, February 1, 2024

"लेकिन नहीं विध्वंस कर पाई उनकी नफ़रत, मेरी अविनाशी अंतरात्मा और आस्था को, जिसके अस्तित्व का संबंध मेरे जीवन से है, उनके अहंकार से नहीं।"

 

स्थानों का महत्व इस बात में भी निहित होता है कि कुछ जगहें आपको भीतर की ओर देखने को मजबूर करती है। कुछ दार्शनिकों ने इसे यह कहकर भी खारिज किया है कि स्वः की अनुभूति के लिए जगहों के चुनाव को महज़ किसी शर्त के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है कयोंकि इसका अधिक संबंध आपके अंतर्मन से है, जिसे कुछ हद तक और कुछ वजहों के चलते स्वीकारा जा सकता है।

लेकिन फिर आप इसे कैसे स्पष्ट करेंगे कि कुछ विशेष स्थानों पर पहुंचने के बाद, किसी सत्ता के सामने सजदा करते हुए जब आप अपनी आंखों को बंद करते है, तो आप भीतर से यह महसूस करते है कि आपने दो कदम 'सत्य' की ओर बढ़ाएं है? साथ ही सवाल यह भी उठ खड़ा होता है कि क्या आप वाकई में किसी सत्ता के सामने झुकते है या असल में आप अपनी अंतरात्मा का सामना कर रहे होते है? क्या आप इस बात का दावा कर सकते है कि सत्य की अनुभूति का होना और जगहों का, आपस में कोई वास्ता नहीं है, उन दोनों का आपसी संबंध बेबुनियाद है? क्या इस सब के पीछे के कारणों में सांस्कृतिक भूगोल के अलावा भी अन्य कोई कारण है या दूसरा कोई दार्शनिक आधार?

किसी के लिए एक ऐसे शहर के बीच खड़ी इमारत भी इबादत का ज़रिया बन सकती है, जिसे इतिहास में कही तबाह किया गया हो। क्या तबाही आस्थाओं को भी विध्वंस कर सकती है? क्या किसी की आस्था को किसी के लिए पूरी तरीके से तबाह कर पाना मुमकिन है?


उन्होंने कई शहर तबाह किए,

नहीं बख्शा हर उम्र के बेकसूरों को भी,

मलबे में तब्दील कर दी गई,

कई इमारतें और इबादत के स्थल।


लेकिन नहीं विध्वंस कर पाई उनकी नफ़रत,

मेरी अविनाशी अंतरात्मा और आस्था को,

जिसके अस्तित्व का संबंध मेरे जीवन से है,

उनके अहंकार से नहीं।।

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01-02-2024

Rahul Khandelwal 

Friday, January 26, 2024

उन्होंने झूठ इसीलिए कहा, क्योंकि वो सच को जानती है।


शाम का वक्त हो चला था। ठंड के मौसम के नज़दीक होने का एहसास इस वक्त ज़्यादा होने लगता है जो की अब धीरे-धीरे होने भी लगा था। अक्षत हर रोज़ की तरह मेज़ के सामने रखी हुई कुर्सी पर विराजमान किताब के पन्ने पलटने में व्यस्त था। कुछ ही देर बाद अपने समय के मुताबिक दीदी भी आ गई और रात का खाना बनने की तैयारी होने लगी।

दो इंसानों के बीच भरोसे की भावना का जन्म यूं ही अनायास ही नहीं होता। मानवीय रिश्तें, गुज़रते हुए समय और एक लंबी प्रक्रिया के चलते गहराते चले जाते है। ‘भरोसा’, जब स्थायी रूप ले लेता है, तो आप अपनी निजी बातचीत साझा करने के लिए सामने वाले व्यक्ति से उसकी इजाज़त नहीं मांगते। एक समय के बाद ख़ुद ही आपको इस बात का एहसास हो जाता है कि अब आपके और सामने वाले व्यक्ति के बीच किसी भी प्रकार का कोई पर्दा नहीं है।

अक्षत भीतर वाले कमरे में बैठा पढ़ाई कर रहा था और दीदी किचन में खाना बना रही थी। उन दोनों के बीच कब और कैसे बातचीत शुरू हुई, मालूम नहीं। किसी बातचीत से निकली हुई कोई महत्वपूर्ण बात इंसान के ज़हन में रह जाती है, लेकिन कभी-कभी हम चाहते हुए भी बातचीत के सिरे को खोज नहीं पाते कि हम इसके अंतिम छोर तक कैसे पहुंचें। बातों के बीच अचानक ही उन्होंने अक्षत से कहा, “भैया, मैं और मेरे पति साथ में नहीं रहते है। मैं यहां दिल्ली में अपने दोनों बच्चों के साथ रहती हूं और वो अलग रहते है।”

(कुछ क्षण के लिए अक्षत सोचने लगा कि इन्होंने मुझसे शुरुआत में झूठ क्यों कहा, क्या वजह रही होगी? इसी सब के बीच उसे ध्यान हो आया कि बीच में एक दिन जब उसे बुखार था तब भी दीदी ने अपने यहां से यह बतलाकर दवा भिजवाई थी कि मेरे पति फार्मेसी में काम करते है, तो हमारे यहां दवा वगैरा रहती है। कई बार इंसान झूठ का सहारा इसीलिए भी लेता है क्योंकि वह समाज के सच को भली-भांति जानता है।)

वो आगे अपने पति से अलग रहने और इस बात को लोगों से छिपाने के कारण बताने लगी। उन्होंने कहा- “भैया, जहां मैं पहले किराए के मकान में रहती थी, वहां आस पास के लोगों को यह मालूम पड़ गया था कि मैं और मेरे पति साथ में नहीं रहते है। यह जानने के बाद उस मोहल्ले में रहने वाले लोगों ने मेरे साथ अच्छा बर्ताव नहीं किया। आप समझ सकते है कि एक महिला को अकेला समझकर समाज में रहने वाले लोग उसके साथ कैसा व्यवहार करते है। जब तक कोई महिला किसी पुरुष के अधीन नहीं है, तो उसकी स्वायत्तता को यह समाज स्वीकार नहीं करता है; तब तक, वह महिला एक वस्तु के समान है। और जैसे ही किसी पुरुष की छाया के नीचे उस महिला को लाकर खड़ा कर दिया जाता है, तो उसके अधिकार को भी उसी पुरुष के साथ जोड़ दिया जाता है और बाकी सबको यह बतला दिया जाता है कि अब आप सभी अपने अधिकार को इस एक महिला पर प्रयोग नहीं कर सकते। इन्हीं सब कारणों की वजह से मैंने वो मकान और इलाका छोड़ दिया है और अब यहां रहने लगी हूं। यहां, मैंने किसी को नहीं बताया है कि मेरे पति, मेरे साथ नहीं रहते है। कोई पूछता है तो कह देती हूं कि वो बाहर काम करते है और बीच-बीच में आते है। इस बारे में यहां किसी को नहीं पता है, बस आपके सामने कह रही हूं।”

कभी-कभी किसी एक ज़ुबान से निकली एक खरी और विचारणीय बात ही आपको एक ऐसे किनारे पर लाकर खड़ा कर देती है, जहां से आप समाज के किसी एक पहलू को पूरी सच्चाई और पारदर्शिता के साथ देख सकते है। इन्हीं सब बातों के बीच जो ख़त्म होकर भी ख़त्म नहीं हुई थी, खाना कब बन कर तैयार हुआ, पता ही नहीं चला। अक्षत, उनकी सभी बातों को ध्यान से सुन रहा था और उनकी बात के पीछे छिपे संदर्भों को तलाशने और समझने का प्रयास कर रहा था कि कैसे समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग अवचेतन रूप में उन सभी भेदभावपूर्ण व्यवस्थाओं को खामोशी पूर्वक स्वीकार करता चला जाता है, जिसे बाद में उन सभी का सचेत मन अपना का एक अटूट हिस्सा मान कर, उन सभी व्यवस्थाओं को वैधता भी प्रदान कर देता है कि उन्हें उन सभी व्यवस्थाओं के भेदभावपूर्ण स्वरूप का पता होते हुए भी पता नहीं चल पाता। शायद इसीलिए ऐसे तमाम सच व्यापक रूप में सामने होते हुए भी नज़र नहीं आते, इनका विरोध तो बहुत दूर की कौड़ी है।

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26-01-2024

Rahul Khandelwal 

Wednesday, January 24, 2024

क्या लफ्ज़ों में सबकुछ बयां करने की क्षमता होती है?


क्यों संवेदनाएं व्यक्त करने के लिए, खोजने से भी शब्द नहीं मिलते? ऐसी परिस्थितियों की ख्वाइश कोई नहीं करना चाहता कि संवेदनाएं (शोक) व्यक्त की जाएं। लेकिन क्या हम जीवन के इस सत्य से भाग सकते है कि इसका अंत निश्चित है?

तो जब कभी मेरा, ऐसे किसी भी मौके से वास्ता पड़ता है, मेरी कलम मेरा साथ कभी नहीं देती। मैं चाहकर भी कुछ लिख नहीं पाता। उन क्षणों में ऐसा लगता है कि मेरे पास बहुत कुछ लिखने-कहने को तो है, लेकिन उसे लिखा और कहा नहीं जा सकता। मानो मैंने सब कुछ लिख दिया हो और लिखकर मिटा दिया हो।

कभी-कभी लिखकर मिटा देना भी 'लिखना' जैसा होता है। संवेदनाओं से भरी भावनाएं व्यक्त करने के लिए हर बार लफ़्ज़ साथ दे, ऐसा ज़रूरी नहीं। तब मैं उन तमाम शख़्स से बस इतना ही कह पाता हूं कि मैं उनके लिए दुआ करता हूं कि उनसे जुड़े उनके अपनों की सभी यादें हमेशा उनके साथ रहें।

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24-01-2024

Rahul Khandelwal

Thursday, January 4, 2024

"आपकी मौजूदगी मुझे सत्य की ओर, और निकट जाने के लिए प्रेरित करती है मां।"


काश मेरे बस में उन सभी खूबसूरत लम्हों को भी कैद करने की क्षमता होती जिन्हें मैं कभी ख़ुद के द्वारा ख़ुद पर चढ़ाई गई तमाम बेबुनियाद परतों की वजह से, करने में असफल रहा। कृत्रिम और झूठ से बनी परतें जिनका आधार भीतरी मन के तत्वों की गवाही ना होकर बाहरी तत्त्व की अधिक होता हैं और जिसकी बनावट का परिणाम भीतरी और बाहरी तत्त्व, दोनों कारकों के बीच के संघर्ष से होकर पैदा होता है। ऐसे में आपका अवचेतन मन उन बाहरी तत्वों को कब और कैसे भीतरी मन पर हावी होने की इजाज़त देता है, आपको ख़बर भी नहीं होती। और चौखट पर दस्तक जिस वक्त होती है, तो बाहर आपका इंतज़ार सिर्फ़ “पश्चाताप” कर रहा होता है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है।

कभी-कभी परिस्थितियां ऐसी होती है कि एक ही समय और स्थान में दो लोगों की उपस्थिति, उन्हें हर बार बातचीत करने का मौका नहीं देती। ऐसी स्थिति पैदा होने पर इंसान अभिव्यक्ति के तमाम तरीके तलाशता है, मैं लेखन का चुनाव करता हूं। आज आपसे कुछ कहने के लिए कर रहा हूं मां।

मां, आपने मुझे कोई धार्मिक किताब का सहारा लेते हुए सत्य–असत्य, सही–गलत के बीच फ़र्क करना नहीं सिखाया है, परवरिश की प्रक्रिया बिलकुल भी औपचारिक नहीं रही। इस सब के बावजूद भी आपसे ख़ूब सीखा है, बहुत कुछ अभी भी शेष है।

अपनों से दूर कोई नहीं होना चाहता है, मजबूरियां इंसान को विवश कर देती है। जब मैं आपसे दूर ना होकर आपके पास होता हूं तो इस अनुभूति से ख़ुद को घिरा हुआ पता हूं कि मेरा मन आपकी मौजूदगी से एक प्रकार की मदद हासिल कर रहा है कि मैं सच और झूठ में फ़र्क कर पाता हूं। आपकी मौजूदगी मुझे सत्य-असत्य के बीच के फ़र्क को समझने में मदद करती है मां। शायद इसीलिए लोग अपने माता-पिता की तस्वीर को अपने बहुत ही निकट रखते भी है। सकारात्मक रूप से देखें, तो एक प्रकार से प्रमाणीकरण और वैधता प्राप्त करने के लिए ऐसा किया जाता है।

जो हमें मन से प्रिय होते है, उनके साथ होने से आप अपने चारों ओर मौजूद संदेहों को मिटता हुआ देखते है और इस एहसास से भी ख़ुद को अवगत कराने में कामयाब हो पाते है कि वो एक-एक संदेह आपके बाहर नहीं, बल्कि भीतर मौजूद है। आप बाहर तलाशने की बजाए भीतर झांक रहे होते है; देखते है कि अब परतें अपना स्थान छोड़ रही है और भीतरी मन और भी अधिक स्पष्ट होता हुआ दिखाई पड़ता है।

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04-01-2024

Rahul Khandelwal 


In the picture, Maa-Papa looking at the sky. 🌸

उपेक्षा

रेत के कण ज़मीन से उठकर हथेली को छूने लगते है अतीत की छुअन वर्तमान में अनुभूति बन जाती है होने वाली सिरहन याद दिलाती है कहती है चीखकर फिर— ...