A Creative Writing Page -Rahul Khandelwal | मेरा अनुभव ही मेरा जीवन है और मेरे हर लेखन में ये दर्ज है।
Tuesday, April 2, 2024
आप अपने जीवन में होने वाली गतिविधियों के कितने हिस्से को पूर्ण रूप से स्वयं निर्धारित करते है?
Sunday, March 31, 2024
मासी का 'खेद', दादी का 'डर' है।
छुट्टी वाले दिन जब कभी मासी के घर जाना होता, तो तीनों पहर का खाना खा चुकने के बाद, अक्सर उनके पास बैठ जाया करता था। वे मुझे अपने अतीत से जुड़े पारिवारिक किस्से कहानियां सुनाया करती थी, जिसमें उनका सुख-दुःख, दोनों शामिल होते थे। साठ की उम्र पार कर चुकने के बाद, इंसान की बातचीत में 'मानवीय जीवन से जुड़ा दर्शन', बिना किसी की इजाज़त के स्थान ले लेता है। ऐसी स्थिति में आप कई बार, गहरा अर्थ लिए हुए कई-सी बातों का सामना करते है और सोचने पर विवश होते है। व्यसकों के पास बैठने से उन्हें भी यह महसूस होता है कि उनकी मन की तहों के नीचे दबी तमाम बातों को सुनने के लिए अभी भी कोई ना कोई उनके आस-पास मौजूद है। शायद वे भी राह देखते होंगे कि कब उन्हें सुनने वाला उनकी इन बातों को सुनने के लिए आएगा।
मेरे व्यवहार ने ऐसे लोगों की संगत को स्वतः ही स्वीकार किया है, जिनकी हर दूसरी बात अपने साथ, कोई ना कोई, इंसान के जीवन के लिए एक नया पाठ लिए होती है। हम सभी में कुछ न कुछ ऐसा भी होता है, जिसके चलते हम बिना जाने बूझे और पूर्व नियोजन के अलग-अलग आदतों का चयन करते है। यह प्रक्रिया इतनी ख़ामोशी से अपना काम करती है कि आपको भनक तक नहीं होती।
कुछ बातें हमें अक्सर याद रह जाया करती है, ख़ासतौर से वे सब, जो हमें मनुष्य के जीवन से जुड़े किसी आयाम पर सोचने को विवश करती है। मैं मासी की कही हुई वह बात कभी नहीं भूल सकता।
हर किसी के लिए दुःख की परिभाषाएं अलग-अलग हो सकती है। यह इस पर भी निर्भर करता है कि आपका परिवेश किस तरह का है और आप किस तरह के वातावरण में पले-बढ़े है, जिसके चलते आपकी चेतना का निर्माण हुआ है और तत्पश्चात् घटनाएं आपको किसी एक तरीके से प्रभावित करती है; चूंकि हर किसी का परिवेश एक-सा नहीं होता है, इसीलिए सबकी चेतना भी एक-सी नहीं होती और फलस्वरूप इस सब का प्रभाव भी सब पर एक-सा नहीं पड़ता। शायद मासी के लिए वहीं सबसे बड़ा दुःख था, जिसे याद कर उस दिन उनकी आंखें नम हो गई थी और फिर उन्होंने कहा था कि "हमने अपने परिवार को बचाए रखने की बहुत कोशिश की, लेकिन आखिरकार वो बिखर ही गया। परिवार के टूट जाने का दुःख बहुत बड़ा होता है बेटा।" मैं उनकी आवाज़ में और नम आंखों में छिपे दर्द को महसूस कर सकता था, हां लेकिन उनके जितना नहीं। शायद वो दुःख उनके लिए सबसे बड़ा दुःख था।
अतीत में गुज़री यह बात और घटना आज फिर मुझ तक लौट आई है। होली की छुट्टियों में घर गया हुआ था। त्योहार समापन पर, लोगों का आपस में मिलना जुलना भी होता है; चूंकि करीबी रिश्तेदार आस पास ही रहते है, तो शाम को बैठक लग जाया करती है। कुछ अवसर शायद इसीलिए भी होते है कि वो लोगों को उनके रिश्ते याद दिला सकें।
हमें याद रखना चाहिए कि घर को घर बनाए रखने में घर के सभी सदस्यों का हाथ होता है; शादी के बाद कुछ सदस्यों के घर बदल जाया करते है, लेकिन वो अपनी सदस्यता कभी नहीं छोड़ते क्योंकि वे उन सबके बीच अपने होने की भूमिका को कभी भूला नहीं पाते है। आपके प्रति ज़िम्मेदारी का भाव भी वही रखता है जो आपको अपना मानता है। जब बुआ घर आती है तो इस भूमिका का हिस्सा बन जाया करती है। दादी भी इस बात को समझती और जानती है, तो उन्हें बुआ के घर पर आने के बाद, उनसे एक प्रकार की उम्मीद भी बंधी रहती है कि अगर छोटी-मोटी बातों पर उनके साथ घर में कुछ भी अन्याय हुआ है, तो उनकी बेटी आकर उन्हें न्याय दिलाएगी। ये सब भी परिवारों के बने रहने की प्रक्रिया का एक हिस्सा होता है।
गांव में आज मुश्किल ही कोई परिवार बचा होगा जो एकजुट होकर रह रहा है, सभी संयुक्त परिवार एकल में तब्दील हो चुके है, उस दिन बुआ ने इसे होली वाले दिन याद भी दिलाया। दादी कभी नहीं चाहती थी कि उनका परिवार औरों की भांति बिखर जाए। इस सब के पीछे के कई सारे कारणों में सबसे बड़ा कारण यह भी है कि अपने समय में दादी के सामने यह एक प्रकार की चुनौती भी थी कि उन्होंने अपने मायके में रहकर तत्कालीन समाज को यह दिखलाने का प्रयास किया था कि एक अकेली औरत भी अपने परिवार को एक-साथ लेकर चल सकती है।
मेरे ज़हन में यह बात 'याद और चिंता' की तरह बनी रहती है, चिंता इसलिए कि क्या हम रुककर कभी सोचते भी है इस सब के बारे में? कुछ सामाजिक और पारिवारिक बदलाव ख़ामोशी से पृष्ठभूमि में रहकर अपना काम करते रहते है; आप उनके कारणों को एक प्रकार की समुद्र में होने वाली हरक़त समझकर उसके ऊपरी सतह पर होते बदलावों को ही देखते रहते है, और नकार देते है सतह के नीचे दूर गहराइयों में और भी तरह के होने वाले बदलावों और हरकतों को।
आज हम "टेकन फॉर ग्रांटेड" से व्याप्त वातावरण में रह रहे है, जहां हम अनजाने में (unknowingly) वे सब भी करते चले जा रहे है, जिसकी इजाज़त अभी तो हमें हमारी उम्र दे रही है क्योंकि हमारे जीवन का ऐतिहासिक काल अभी छोटा है। लेकिन जैसे-जैसे इंसान के जीवन के ऐतिहासिक काल की समय सीमा बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे उसके जीवन में पछतावों का ढ़ेर लगता रहता है। तब उसे उसकी उम्र की गति भी आगे की ओर तेज़ बढ़ती हुई दिखालाई पड़ती है और उससे भी अधिक तेज़ दिखलाई पड़ता है उसे- "उसका पीछा करता हुआ, उसका ख़ुद का अपना इतिहास।"
ख़ैर। मासी, जिसे तमाम कोशिशों के बाद भी बचा नहीं सकी, दादी उसे खोना नहीं चाहती है। अब मासी के मन में खेद है, और दादी के, डर।
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31-03-2024
Rahul Khandelwal
Note: तस्वीर दादी की है।
Friday, March 15, 2024
जसिंता केरकेट्टा के एक कथन पर टिप्पणी।
Thursday, March 14, 2024
मधु कांकरिया जी की कहानी "जगह खाली है" पर एक टिप्पणी।
हंस कथा मासिक के मार्च अंक में प्रकाशित मधु कांकरिया जी की कहानी "जगह खाली है" को पढ़ा आज। कहानी को कहने और लिखने के जिस अंदाज़ को आप अख़्तियार करती है, ऐसा लगता है मानो इंसान ख़ुद ही ख़ुद से संवाद करता चला जा रहा है। कई जगहों पर ऐसे वाक्य पढ़ने को मिलते है जो मानवीय व्यवहार से जुड़े दर्शन और सच्चाई को आपके सामने लाकर रख देते है। कुछ घटनाओं के चलते जिनका प्रत्यक्ष रूप से कई बार हमारा कोई संबंध भी नहीं होता, उनमें फंसकर इंसान अनिच्छापूर्वक अपनी अवस्था को छोड़ दूसरी अवस्थाओं में प्रवेश करने पर मजबूर हो जाता है, तो मालूम पड़ता है कि ज़िंदगी का कितना थोड़ा भाग उसने अभी देखा है और उन तमाम दूसरी अवस्थाओं में दाख़िल होने के बाद वहां मौजूद समस्याओं और भेदभाव को देख वो ख़ुद को कितना असहाय महसूस करता है, इसके बारे में भी यह कहानी पढ़कर पता चलता है।
सत्ताधीशों द्वारा बनाए गए नियमों और कानूनों का दुरुपयोग कभी-कभी इंसान के मस्तिष्क की सोच और संभावनाओं से दूर निवास कर रहे एक प्रकार की साज़िश का रूप ग्रहण कर उसके खिलाफ किया जा सकता है, उनकी कहानी पढ़कर यह भी मालूम पड़ता है।
इंसान की स्मृतियां कभी उसका साथ नहीं छोड़ती है। आप स्मृतियों को लांघ कर कोसों दूर निकल आते है, एक लंबा सफ़र तय करने पर भी स्मृतियों के कुछ अवशेष आपकी परछाई बनकर आपका पीछा कभी नहीं छोड़ते, अंतिम सांस तक भी नहीं। इंसान के लिए गुज़रे हुए अतीत में कुछ घटनाओं की छांप और जड़े इतनी गहरी होती है कि वो गुज़र रहे (मौजूदा) समय में आपकी बिना इजाज़त लिए कभी-भी आपके वर्तमान के दरवाज़े पर दस्तक देती है, आपके मन और मस्तिष्क में प्रवेश करती है और आपकी तमाम कोशिशों के बाद भी बीतती नहीं। सिवाए इसके कि आप बिना किसी दूसरे विकल्प के, बेबस और मजबूर होकर उन अनुभूतियों को महसूस करने के लिए सिर्फ़ बाध्य हो सकते है, और कुछ नहीं। मुझे लगता है कि स्मृतियाँ, बारिश के बाद मिट्टी में जन्म लेने वाली अवांछित जड़ें जैसी होती है जिसके ना बीज बोयें जाते है, ना उनमें पानी दिया जाता है और ना खाद डाली जाती है। अतीत गुज़र जाता है लेकिन कुछ अधूरी रह गई ख्वाइशें, अनकिया को करने की इच्छाएं, इंसान को उसका शेष जीवन त्यागने की इजाज़त नहीं देती। लेकिन सवाल ये आ जाता है कि क्या हर किसी को यह मौका मिल पाता है? कहानी पढ़कर यह सब के बारे में भी पता लगता है।
आपने मनुष्य व्यवहार की अलग-अलग परतों को उतार, नीचे उसके भीतर, निवास कर रहे अलग-अलग मनुष्यों को दिखाने का प्रयास किया है जो प्रेम, सुख, दुःख, पीड़ा, पछतावा, शैतान से भरे ख्यालों और इन सब उलझनों को सुलझाने की जद्दोजहद में लगा रहता है।
शुक्रिया ये कहानी लिखने के लिए।
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14-03-2024
Rahul Khandelwal
Thursday, March 7, 2024
क्या तुम्हें ख़ुद से डर नहीं लगता?
आंसू बहाना बंद कर दिया है
यह सब कितना असामान्य है
कि हार रही मनुष्यता को देख
सभी चैन की नींद कैसे सो पाते है?
क्या तुम सो पाओगे चैन से
गर तुमको जान पड़े कि
कई माएं खो चुकी है
अपनी बेकसूर संतानों को?
और यह सब जान कर भी
अब तुम्हारी ख़ुद की आंखों ने भी
आंसू बहाना बंद कर दिया है।
जवाब दो, क्या ख़ुद में होते हुए
इस बदलाव को देखकर भी
तुम्हें ख़ुद से डर नहीं लगता?
क्या तुम्हें डर नहीं लगता यह सब सोच कर भी
कि ख़ुद के सामने तुम देख रहे हो
असामान्य को सामान्य में तब्दील होते हुए?
बोलो, इतने बेबस और बुज़दिल कैसे हुए तुम?
जवाब दो।
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07-03-24
Rahul Khandelwal
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Published in "KRITYA Poetry Journals." Click on this link and scroll down to the bottom.
Note: This poem is dedicated to all the innocent children who have died so far in the Israel-Palestine conflict.
Saturday, March 2, 2024
स्मृतियाँ, बारिश के बाद मिट्टी में जन्म लेने वाली अवांछित जड़ें जैसी होती है।
Wednesday, February 21, 2024
अविनाशी अंतरात्मा
आपकी अंतरात्मा के अस्तित्व का संबंध आपके जीवन से है, विध्वंसता से नहीं।
उन्होंने कई शहर तबाह किए
नहीं बख्शा हर उम्र के बेकसूरों को भी
मलबे में तब्दील कर दी गई
कई इमारतें और इबादत के स्थल
लेकिन नहीं विध्वंस कर पाई उनकी नफ़रत
मेरी अविनाशी अंतरात्मा और आस्था को
जिसके अस्तित्व का संबंध मेरे जीवन से है
उनके अहंकार से नहीं
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01-02-2024
Rahul Khandelwal
हिंद रजब
उस हर एक दूसरे व्यक्ति की तरह ही
जो गर उन परिस्थितियों में होता
तो डर का ही चुनाव करता बिना झिझके
उसकी मदद से भरी गुहार और आवाज़ को सुनने के बावजूद
अपने हित के खो जाने के डर की वजह से मदद ना करना
चारों ओर गूंजती पुकार को अनसुना कर फिरसे डरना
किसी भी रूप में प्राकृतिक तो नहीं था
हम खो रहे है हर दिन
अंतःकरण से आने वाली आवाज़ को सुनने की क्षमता
कि घटनाओं के पीछे छिपे संदर्भ असल है या नकली
और कौनसे कारक प्राकृतिक है और कौनसे कृत्रिम
इन्हें पहचानने की दृष्टि अब हममें शेष नहीं
मौजूदा समय की स्थियियां इस बात की गवाह है
कि इंसान गुज़रते हुए समय के साथ बुज़दिल हो रहा है
कि उसके लिए अब सही और गलत का निर्णय
सिर्फ उसके हित और अहित पर निर्भर करता है
असल में क्या सही है और क्या गलत
क्या सत्य है और क्या असत्य, इस पर नहीं
दुखद है ये कि क्षीण हो रही है क्षमता
अंतःकरण को सुनने की
वंचित हो रहा है मनुष्य
अपनी ही अंतरात्मा की आवाज़ से
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21-02-2024
Rahul Khandelwal
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Published in "KRITYA Poetry Journals." Click on this link and scroll down to the bottom.
Note: This poem is dedicated to six years old Hind Rajab who lost her life during Israel-Palestine conflict.
Friday, February 9, 2024
क्या आपकी चेतना का निर्माण आप स्वयं करते है?
क्या आपने कभी उन कारकों पर ध्यान दिया है जिनकी वजह से आपकी चेतना का निर्माण होता है और तत्पश्चात् आप विभिन्न विषयों पर अपनी राय व्यक्त करते है और अलग-अलग विकल्पों के बीच से किसी एक का चुनाव करते है?
"बाहरी और भीतरी 'मैं' के बीच के वाद-विवाद की उलझनों में फंसा मनुष्य क्या इस अनंत काल तक चलने वाली प्रक्रिया से बाहर आ सकता है कभी? एक व्यवहारिकरण पर ज़ोर देता है, तो दूसरा इस कृत्रिम व्यवहार के बीच व्याप्त 'सत्य' और 'असलियत' की ओर चलने को बाध्य करता है। क्या इन दोनों के बीच की बहस में से, हम असल की पहचान का चुनाव कर पाएंगे कभी? या हम अभिनय करने के इतने आदी हो गए है कि असल को जानते हुए भी नकार देना चाहते है उस 'सत्य' को, जिसकी समाप्ति के लिए हम हर दिन कृत्रिमताओं पर आधारित अनावश्यक संघर्ष करते चले जा रहे है?"
यह एक ऐसी रणभूमि है, जो सदैव अदृश्य रहती है।
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09-02-2024
Rahul Khandelwal
Thursday, February 1, 2024
"लेकिन नहीं विध्वंस कर पाई उनकी नफ़रत, मेरी अविनाशी अंतरात्मा और आस्था को, जिसके अस्तित्व का संबंध मेरे जीवन से है, उनके अहंकार से नहीं।"
स्थानों का महत्व इस बात में भी निहित होता है कि कुछ जगहें आपको भीतर की ओर देखने को मजबूर करती है। कुछ दार्शनिकों ने इसे यह कहकर भी खारिज किया है कि स्वः की अनुभूति के लिए जगहों के चुनाव को महज़ किसी शर्त के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है कयोंकि इसका अधिक संबंध आपके अंतर्मन से है, जिसे कुछ हद तक और कुछ वजहों के चलते स्वीकारा जा सकता है।
लेकिन फिर आप इसे कैसे स्पष्ट करेंगे कि कुछ विशेष स्थानों पर पहुंचने के बाद, किसी सत्ता के सामने सजदा करते हुए जब आप अपनी आंखों को बंद करते है, तो आप भीतर से यह महसूस करते है कि आपने दो कदम 'सत्य' की ओर बढ़ाएं है? साथ ही सवाल यह भी उठ खड़ा होता है कि क्या आप वाकई में किसी सत्ता के सामने झुकते है या असल में आप अपनी अंतरात्मा का सामना कर रहे होते है? क्या आप इस बात का दावा कर सकते है कि सत्य की अनुभूति का होना और जगहों का, आपस में कोई वास्ता नहीं है, उन दोनों का आपसी संबंध बेबुनियाद है? क्या इस सब के पीछे के कारणों में सांस्कृतिक भूगोल के अलावा भी अन्य कोई कारण है या दूसरा कोई दार्शनिक आधार?
किसी के लिए एक ऐसे शहर के बीच खड़ी इमारत भी इबादत का ज़रिया बन सकती है, जिसे इतिहास में कही तबाह किया गया हो। क्या तबाही आस्थाओं को भी विध्वंस कर सकती है? क्या किसी की आस्था को किसी के लिए पूरी तरीके से तबाह कर पाना मुमकिन है?
उन्होंने कई शहर तबाह किए,
नहीं बख्शा हर उम्र के बेकसूरों को भी,
मलबे में तब्दील कर दी गई,
कई इमारतें और इबादत के स्थल।
लेकिन नहीं विध्वंस कर पाई उनकी नफ़रत,
मेरी अविनाशी अंतरात्मा और आस्था को,
जिसके अस्तित्व का संबंध मेरे जीवन से है,
उनके अहंकार से नहीं।।
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01-02-2024
Rahul Khandelwal
उपेक्षा
रेत के कण ज़मीन से उठकर हथेली को छूने लगते है अतीत की छुअन वर्तमान में अनुभूति बन जाती है होने वाली सिरहन याद दिलाती है कहती है चीखकर फिर— ...









