Saturday, May 4, 2024

क्या मानवीय स्वभाव के कुछ हिस्से इंसान को सुदृढ़ भी बनाते है? अनित्यता के सिद्धांत को कहां तक लागू किया जा सकता है?

बदलाव निरंतर घट रहे समय का एक अहम और ज़रूरी हिस्सा होता है। लेकिन कुछ कहानियां ऐसी भी होती है जिसमें उससे संबंधित उसके कुछ हिस्से और किस्से शामिल होते है, जिनमें महत्वपूर्ण रूप से उस कहानी से जुड़े पात्रों का मानवीय व्यवहार अर्थात् स्वभाव अंतर्निहित होता है, जो उन पात्रों की बढ़ती उम्र और घटते समय के साथ, बजाए बदलने के दिन-प्रतिदिन और भी गहरा होता चला जाता है।

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21-02-2022
Rahul Khandelwal

Note: The picture is taken from internet.

Friday, May 3, 2024

Words of Experience and Human Behavior.

 


• Some people go through dark times; they know very well and understand the consequences of that period, as they’ve already faced all the difficulties while coming out of that phase. Although the phase is passed from their lives, it is better to say that the same appears to be passed superficially but not wholly. Scars fade, not erase completely, with time.

• Your behavior of not pointing out someone about what is right or wrong and not making someone aware of his or her wrongdoings and absorbing everything said in a very docile manner without posing your arguments in a way that sometimes provides space for the person (for others) to control you. Not showing dissent may put you under someone’s thumb.

Wise humans understand that not dissenting by anyone doesn't show one's acceptance, but the majority see this as an opportunity to have control over you.

• It is important for all to have a sense of realization, but the truth is that very few have such a sense. Having a timely sense of realization makes you a better human being, as it checks all your actions at every step. It can disturb you enough if you realize it very late, as then you’re left only with regrets.

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03-05-2024

Rahul Khandelwal

Tuesday, April 23, 2024

विनती


हे संचालक! दृष्टि दें और ले चल।

कृत्रिमताओं से सत्यता की ओर।।


बाहरी-अप्राकृतिक लोक से,

आंतरिक दुनिया की ओर।

इस कदर,

कि मुलाकात हो सकें–

सत्य से, स्वत्व से;

ब्रह्मन् से और आत्मन् से।।


और हो सकें,

भीतरी दुनिया की मुलाकात भी,

प्रकृति से,

और उसके परे की दुनिया से।।

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23-04-2024

Rahul Khandelwal 

Sunday, April 21, 2024

उनकी उम्मीद व्यर्थ ना जाने दें। उन्हें सुनें, ताकि हो सकें उनकी पूर्ण विदाई।


चूंकि कुछ लोग अभी भी मौजूद है जो ख़ुद को कम से कम इस निगाह से तो खुशनसीब कह ही सकते है कि उनके पास उनके अपने एक पीढ़ी, दो पीढ़ी बड़े लोग परिवार के रूप में मौजूद है। मैंने देखा है कि हमसे बड़ी पीढ़ी के लोगों में धैर्य और इंतज़ार करने की क्षमता अधिक होती है। ऐसे कई-से लोग एक लंबा वक्त गुज़ार, इंतज़ार करते है उस घड़ी का जब उनके पास उन्हें सुनने के लिए उनका कोई अपना आता है।

अलग-अलग ढांचों (जैसे परिवार) और संस्थाओं में उपस्थित मनुष्यों के जीवन से जुड़ी उनकी अपनी कहानियां दूर से दिखलाई तो पड़ती है, लेकिन जैसे-जैसे आप उसके निकट जाते रहते है, उनकी वही कहानी आपको भरम मात्र जान पड़ती है। व्यवस्थाएं, इंसान को, उसके भेद खोलने की अनुमति हर किसी के सामने नहीं देती और ना ही उसमें आने वाले हर एक को दूसरे के सुख-दुख सुनने की क्षमता देती है; बजाए इसके, व्यवस्थाएं बांधती है मनुष्यों के सुख-दुख की परिभाषाएं और व्यवहार को, सुनिश्चित करती है खुद के द्वारा बनाए गए ढांचे और बना देती है उसमें आने वाले सभी लोगों को उनका आदी । शायद इसीलिए अगर कभी कोई उस रेखा से दाएं-बाएं हटकर कुछ कहना भी चाहे, तो कहने वाला और उसकी बात, दोनों ही सभी को अटपटी लगने लगती है। ढांचे मनुष्यों को सत्य का साथ देने की इजाज़त भी नहीं देते, वे उन्हें हित-अहित के चक्रव्यूह में फंसाकर रखते है।

शायद इसीलिए भी लोग इंतज़ार करते है किसी अपने का जो इन ढांचों में रहकर भी उनकी बात को सहजता के साथ सुनें और समझने का प्रयास भी करें; और साथ ही साथ ऐसी स्थिति में वे लोग यह भी सोचते है कि थोड़ी हिम्मत कर थोड़ा सच बोल सकें। जिस तरह वे इंतज़ार करते है, उसी तरह उनके भीतर का दुःख भी इंतजार करता है कि बातचीत के दौरान इनके शरीर से बाहर निकल इनके मन को थोड़ा हल्का कर सकें। व्यवस्थाओं में रहते हुए मनुष्य सच की गांठें नहीं खोलता और ना ही अपने दुःख की परतें उतारता है। ऐसा नहीं है कि वो अपनी असहमति को दर्ज नहीं करता, वो कभी-कभी विरोध भी जताता है, लेकिन वो जानता है कि उसके अस्तित्व की शर्त ही यही है कि ढांचों को कायम रखा जाएं।

जब उन्हें सुनने के लिए उनका अपना कोई उनके पास पहुंचता है तो झलकने लगता है उनकी आंखों से उनका दुःख और निकलने लगता है उनकी ज़बान से सच जिसे मन के तहकानों में दबाया हुआ था कहीं कई दिनों से। वो याद करने लगता है अपने अतीत को, मां-बाप को, अपने रिश्तों को जैसे याद किया था नवपाषाण काल में उस बूढ़े आदमी ने अपने पूर्वजों को और कहा था अपने समकालीन तरूणों से कि उनके समय की पीढ़ी आज के समय की पीढ़ी से बेहतर थी।

शायद ऐसे सभी लोग मजबूर है। मजबूर है उन सभी का साथ देने के लिए और उनके खिलाफ ना बोलने के लिए, जिनका साथ वे अपनी अंतरात्मा की इजाज़त से देना नहीं चाहते।

हां, वे मजबूर है। काश! वे मजबूर ना होते और कह देते वो सब कुछ, जो अनकहा है अब तक कि विदाई के वक्त एक भी पश्चाताप ना बचें, जो उन्हें मजबूर कर सकें इस लोक से ना जाने के लिए और रोक लें उन्हें यहीं किसी अन्य रूप में और बाधक बन जाएं उनकी पूर्ण विदाई में।

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21-04-2024

Rahul Khandelwal


Note: The picture is taken from internet.

Wednesday, April 10, 2024

अन्वेषक

 


परत-दर-परत तार रहा हूं चादरें

ताकि गहराईयों में तलाश सकूं

प्रक्रियाओं के पीछे छिपी वास्तविकताओं को

कि देख सकूं वो सूक्ष्म परिभाषाएं

और जान सकूं

और भी बेहतर तरीके से

फ़र्क को

सही और गलत के बीच

कि थोड़ा और अधिक इंसान बन सकूं


परत-दर-परत, उतार रहा हूं चादरें

कि सुलझा सकूं

इन मानव निर्मित गुत्थियों को

जिसका अस्तित्व प्राकृतिक नहीं

बल्कि इतिहास के किसी दौर में

छोड़ आया था मनुष्य इन्हें कहीं 

जो तबसे चली आ रही है अबतक

कई सभ्यताओं से गुज़रकर


परत-दर-परत, उतार रहा हूं चादरें

कि परख सकूं

सच और झूठ के ज्ञान को

और कर सकूं दोनों के बीच अंतर

जिसने ओढ़ लिए है अब

कई-से कृत्रिम आवरण


हे संचालक! दृष्टि दें और ले चल,

कृत्रिमताओं से सत्यता की ओर।।

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10-04-2024

Rahul Khandelwal

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Saturday, April 6, 2024

क्या आपके विचार आपके ख़ुद के असल विचार है? कहीं वे सब प्रभावशाली संस्कृति से प्रभावित तो नहीं?

 


"सामाज के अलग-अलग वर्गों में तरह-तरह के इंसानों के व्यवहार और उनकी अवस्थाओं के पीछे छिपे संदर्भों को, सामाजिक पायदान में निचले स्थान पर आने वाला सामाजिक वर्ग, पहचानने और देखने में नाकामयाब रहा है या स्थापित मान्यताओं, ढांचों को और अधिक सुदृढ़ और इनसे जुड़े हुए अपने निजी हित को सुरक्षित बनाएं रखने में समाज के कुछ वर्ग हमेशा से उससे जुड़ी हुई विचारधाराओं को इस कदर और इस प्रकार प्रचारित एवं प्रसारित करते रहे है कि सभी को वो कृत्रिम ढांचे असल नज़र आने लगे, जिसके फलस्वरूप वो तथाकथित निचला वर्ग उन सभी संरचनाओं को पहचानने और देखने में नाकामयाब रहा और स्वीकार करता रहा वो सब, जो उसका अपना नहीं था?"

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05-04-2024

Rahul Khandelwal 

Tuesday, April 2, 2024

इंसान को अपने भीतर “ख़ुद और मैं” के अस्तित्व को ज़रूर बचाएं रखना चाहिए।


इंसान को अपने भीतर “ख़ुद और मैं” के अस्तित्व को ज़रूर बचाएं रखना चाहिए। इतिहास गवाही देता है इस बात की कि जब-जब महान लोगों के समक्ष “मैं” के अस्तित्व पर तमाम प्रकार के आक्रमण का प्रयास किया गया है या समझौता करने का प्रस्ताव रखा गया है, तो वो उनके साथ चाहकर भी समझौता नहीं कर पाए है।

और शायद यही वो बात भी है जो “सुख और चैन” की परिभाषा को अलग भी करती है। बाहरी जीवन में चल रहे युद्ध के साथ-साथ एक युद्ध निरंतर मनुष्य के मन के भीतर भी चलता है। बस चिंतन-मनन के चलते सही निर्णय लेने की ज़िम्मेदारी हम में ज़िंदा रहें, यही दुआ है। अपना ख़्याल रखें दोस्त। तुम्हें ईश्वर के अस्तित्व का विश्वास जिस किसी भी परिभाषा में हो, वो तुम्हें तुम्हारे मन के भीतर चल रही जद्दोजहद से लड़ने की हिम्मत और ताकत दें।

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15-03-2024

Rahul Khandelwal 


आप अपने जीवन में होने वाली गतिविधियों के कितने हिस्से को पूर्ण रूप से स्वयं निर्धारित करते है?


तारीखों में संस्कृतियों का व्याप्त होना और समय के उपकरणों के अनुसार संस्कृतियों से जुड़े हुए उत्सवों को मनाना, जिसे ख़ुद कभी अतीत में मनुष्यों ने ही बनाया, गढ़ा और तय किया था, मनुष्यों की गतिविधियों को अपने अनुसार संचालित करता है। किसी विशेष समुदाय के मोहल्लों और घरों के पास से गुज़रती सड़कों पर लोगों और वाहनों का होना और ना होना, कभी-कभार उनका अपना निजी चुनाव नहीं होता, कुछ और भी कारक होते है जो उन्हें निर्धारित कर रहे होते है। क्या इन सबसे होने वाले बदलावों को आप अपने आस-पास देख पाते है? आप अपने जीवन में होने वाली गतिविधियों के कितने हिस्से को पूर्ण रूप से स्वयं निर्धारित करते है? गौर करिएगा।
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28-03-2024
Rahul Khandelwal 

Sunday, March 31, 2024

मासी का 'खेद', दादी का 'डर' है।


छुट्टी वाले दिन जब कभी मासी के घर जाना होता, तो तीनों पहर का खाना खा चुकने के बाद, अक्सर उनके पास बैठ जाया करता था। वे मुझे अपने अतीत से जुड़े पारिवारिक किस्से कहानियां सुनाया करती थी, जिसमें उनका सुख-दुःख, दोनों शामिल होते थे। साठ की उम्र पार कर चुकने के बाद, इंसान की बातचीत में 'मानवीय जीवन से जुड़ा दर्शन', बिना किसी की इजाज़त के स्थान ले लेता है। ऐसी स्थिति में आप कई बार, गहरा अर्थ लिए हुए कई-सी बातों का सामना करते है और सोचने पर विवश होते है। व्यसकों के पास बैठने से उन्हें भी यह महसूस होता है कि उनकी मन की तहों के नीचे दबी तमाम बातों को सुनने के लिए अभी भी कोई ना कोई उनके आस-पास मौजूद है। शायद वे भी राह देखते होंगे कि कब उन्हें सुनने वाला उनकी इन बातों को सुनने के लिए आएगा।

मेरे व्यवहार ने ऐसे लोगों की संगत को स्वतः ही स्वीकार किया है, जिनकी हर दूसरी बात अपने साथ, कोई ना कोई, इंसान के जीवन के लिए एक नया पाठ लिए होती है। हम सभी में कुछ न कुछ ऐसा भी होता है, जिसके चलते हम बिना जाने बूझे और पूर्व नियोजन के अलग-अलग आदतों का चयन करते है। यह प्रक्रिया इतनी ख़ामोशी से अपना काम करती है कि आपको भनक तक नहीं होती।

कुछ बातें हमें अक्सर याद रह जाया करती है, ख़ासतौर से वे सब, जो हमें मनुष्य के जीवन से जुड़े किसी आयाम पर सोचने को विवश करती है। मैं मासी की कही हुई वह बात कभी नहीं भूल सकता।

हर किसी के लिए दुःख की परिभाषाएं अलग-अलग हो सकती है। यह इस पर भी निर्भर करता है कि आपका परिवेश किस तरह का है और आप किस तरह के वातावरण में पले-बढ़े है, जिसके चलते आपकी चेतना का निर्माण हुआ है और तत्पश्चात् घटनाएं आपको किसी एक तरीके से प्रभावित करती है; चूंकि हर किसी का परिवेश एक-सा नहीं होता है, इसीलिए सबकी चेतना भी एक-सी नहीं होती और फलस्वरूप इस सब का प्रभाव भी सब पर एक-सा नहीं पड़ता। शायद मासी के लिए वहीं सबसे बड़ा दुःख था, जिसे याद कर उस दिन उनकी आंखें नम हो गई थी और फिर उन्होंने कहा था कि "हमने अपने परिवार को बचाए रखने की बहुत कोशिश की, लेकिन आखिरकार वो बिखर ही गया। परिवार के टूट जाने का दुःख बहुत बड़ा होता है बेटा।" मैं उनकी आवाज़ में और नम आंखों में छिपे दर्द को महसूस कर सकता था, हां लेकिन उनके जितना नहीं। शायद वो दुःख उनके लिए सबसे बड़ा दुःख था।

अतीत में गुज़री यह बात और घटना आज फिर मुझ तक लौट आई है। होली की छुट्टियों में घर गया हुआ था। त्योहार समापन पर, लोगों का आपस में मिलना जुलना भी होता है; चूंकि करीबी रिश्तेदार आस पास ही रहते है, तो शाम को बैठक लग जाया करती है। कुछ अवसर शायद इसीलिए भी होते है कि वो लोगों को उनके रिश्ते याद दिला सकें।

हमें याद रखना चाहिए कि घर को घर बनाए रखने में घर के सभी सदस्यों का हाथ होता है; शादी के बाद कुछ सदस्यों के घर बदल जाया करते है, लेकिन वो अपनी सदस्यता कभी नहीं छोड़ते क्योंकि वे उन सबके बीच अपने होने की भूमिका को कभी भूला नहीं पाते है। आपके प्रति ज़िम्मेदारी का भाव भी वही रखता है जो आपको अपना मानता है। जब बुआ घर आती है तो इस भूमिका का हिस्सा बन जाया करती है। दादी भी इस बात को समझती और जानती है, तो उन्हें बुआ के घर पर आने के बाद, उनसे एक प्रकार की उम्मीद भी बंधी रहती है कि अगर छोटी-मोटी बातों पर उनके साथ घर में कुछ भी अन्याय हुआ है, तो उनकी बेटी आकर उन्हें न्याय दिलाएगी। ये सब भी परिवारों के बने रहने की प्रक्रिया का एक हिस्सा होता है।

गांव में आज मुश्किल ही कोई परिवार बचा होगा जो एकजुट होकर रह रहा है, सभी संयुक्त परिवार एकल में तब्दील हो चुके है, उस दिन बुआ ने इसे होली वाले दिन याद भी दिलाया। दादी कभी नहीं चाहती थी कि उनका परिवार औरों की भांति बिखर जाए। इस सब के पीछे के कई सारे कारणों में सबसे बड़ा कारण यह भी है कि अपने समय में दादी के सामने यह एक प्रकार की चुनौती भी थी कि उन्होंने अपने मायके में रहकर तत्कालीन समाज को यह दिखलाने का प्रयास किया था कि एक अकेली औरत भी अपने परिवार को एक-साथ लेकर चल सकती है।

मेरे ज़हन में यह बात 'याद और चिंता' की तरह बनी रहती है, चिंता इसलिए कि क्या हम रुककर कभी सोचते भी है इस सब के बारे में? कुछ सामाजिक और पारिवारिक बदलाव ख़ामोशी से पृष्ठभूमि में रहकर अपना काम करते रहते है; आप उनके कारणों को एक प्रकार की समुद्र में होने वाली हरक़त समझकर उसके ऊपरी सतह पर होते बदलावों को ही देखते रहते है, और नकार देते है सतह के नीचे दूर गहराइयों में और भी तरह के होने वाले बदलावों और हरकतों को।

आज हम "टेकन फॉर ग्रांटेड" से व्याप्त वातावरण में रह रहे है, जहां हम अनजाने में (unknowingly) वे सब भी करते चले जा रहे है, जिसकी इजाज़त अभी तो हमें हमारी उम्र दे रही है क्योंकि हमारे जीवन का ऐतिहासिक काल अभी छोटा है। लेकिन जैसे-जैसे इंसान के जीवन के ऐतिहासिक काल की समय सीमा बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे उसके जीवन में पछतावों का ढ़ेर लगता रहता है। तब उसे उसकी उम्र की गति भी आगे की ओर तेज़ बढ़ती हुई दिखालाई पड़ती है और उससे भी अधिक तेज़ दिखलाई पड़ता है उसे- "उसका पीछा करता हुआ, उसका ख़ुद का अपना इतिहास।"

ख़ैर। मासी, जिसे तमाम कोशिशों के बाद भी बचा नहीं सकी, दादी उसे खोना नहीं चाहती है। अब मासी के मन में खेद है, और दादी के, डर।

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31-03-2024

Rahul Khandelwal 


Note: तस्वीर दादी की है।

Friday, March 15, 2024

जसिंता केरकेट्टा के एक कथन पर टिप्पणी।


जसिंता केरकेट्टा लिखती है कि "मेरा गांव. मेरा देश. राष्ट्र प्रतीकों में फंसा रहता है. उसकी पीड़ा प्रतीकों से जुड़ी रहती है. पर देश लोगों के भीतर बसा होता है. वह एक दूसरे की परवाह करता है. एक दूसरे की पीड़ा समझता है. लंबी यात्रा से अपने समुदाय के बीच लौट आने पर जिस तरह वह परवाह करता है, लगता है देश बचा हुआ है."

इस पर मेरी टिप्पणी-

अगर मैं राष्ट्र और देश की कई परिभाषाओं में से एक इस परिभाषा को जस का तस मान लूं तो कितना सच मालूम पड़ता है इसे पढ़ने के बाद। कई बार लगता है हम 'सो कॉल्ड' ऐसे वर्ग का हिस्सा होने पर गर्व महसूस करते है जिसे पढ़ा लिखा और चिंतनशील व्यक्तियों के समूह का हिस्सा होने का टैग प्राप्त है। वहीं इसी वर्ग को गहराई से देखने पर मालूम पड़ता है कि इस वर्ग ने कितनी प्रकार की अलग–अलग 'वाद' से बुनी हुई चादरों से ख़ुद को ढ़का हुआ है और ये भीतर ही भीतर कितना विभाजित है। ऐसा नहीं है कि ये ख़ुद को इतना सहिष्णु बनाने में कामयाब रहा है कि इसे ठेस ही नहीं पहुंचती और ये आहत भी नहीं होता। नहीं। 'निर्णय और सत्य' जितने नज़दीक जान पड़ते है, उतने होते नही है। वो सतह पर ना होकर गहराई में निवास करते है।

राष्ट्र की और देश की चिंताओं में कितना अंतर है। कई बार राष्ट्र अपनी चिंताओं में, उस से जुड़े विमर्श में इतना व्यस्त हो जाता है कि देश से उसकी दूरी कब बनती चली जाती है कि उसे ख़ुद को ही मालूम नहीं पड़ता। राष्ट्र इतना और इस क़दर व्यस्त होता है उन विमर्शों में कि इसमें भाग लेने वाले लोगों का समूह (वर्ग) समझने लगता है कि देश सच में कितना विभाजित है। वहीं दूसरी तरफ़ जब मैं गांव, अपने समुदाय के लोगों के बीच पहुंचता हूं तो देश और वहां पर मौजूद लोग आदर सत्कार कर आपका स्वागत करते है। ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती हैं। उनकी चिंताओं का हिस्सा किसी वाद के ख़त्म हो जाने का डर ना होकर अपनी निजी ज़रूरतों को कैसे पूरा किया जाएं, अपनी चिंताओं से कैसे निदान पाया जाएं– यह अधिक होता है।

प्राचीन काल में बुद्ध ने, महावीर ने, अशोक ने; बाद में अगर मध्यकाल में देखें तो अमीर खुसरो ने, बाबर द्वारा दी गई हुमायूं को सलाह, अकबर ने; आधुनिक काल में गांधी ने और भी तमाम लोग, जिनका आमजन को जनभाषा में संदेश पहुंचाने पर कितना ज़ोर था। शायद इसके महत्व को हम उस तरह से नहीं समझ पाए है जितना की समझना चाहिए था। हम इस उम्मीद में कि जनसमूह के एक बहुत बड़े तबके को बदलना है, उनकी सोच में बदलाव लाना है लेकिन इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए हम उस जनसमूह के बड़े तबके के बीच बोली और समझी जाने वाली बोलचाल और जनभाषा का इस्तेमाल करने से हिचकिचाते है और इस प्रकार के विमर्शों के विस्तार को उन्हीं एक-से सौ-दो सौ लोगों तक सीमित कर उन्हीं के बीच दोहराते रहते है। आप इसे हिपोक्रिसी या विरोधाभास कुछ भी कह सकते है। शायद एक अंतर राष्ट्र और देश में यह भी है।
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Rahul Khandelwal
19-06-2023
 

Intangible

Heat evaporates from inside I open all the windows assuming that the stranger is outside Conscience continues to weep I wonder, why do some ...