Sunday, December 31, 2023

"क्या आपके अच्छे-बुरे अनुभव आपसे आपके 'वास्तविक मैं' को हमेशा के लिए छीन लेने का सामर्थ्य रखते है?"


उसकी पढ़ने की मेज़ पर शीशा रखा हुआ था कि अचानक उसकी निगाह ने चंद मिनटों के लिए ख़ुद को किताब से किनारा करते हुए शीशे की ओर देखा। इंसान के लिए ख़ुद को देखना भी कभी-कभी कितना चुनौती भरा हो सकता है, ये उसने उस दिन जाना था, मानो वो अपने ऊपर से परतें दर परतें उतार भीतर के अपने "मैं" को देखने से हिचकिचा रहा हो। सतह पर 'सत्य' निवास नहीं करता, वहां वो ओझल-सा प्रतीत होता हुआ दिखाई पड़ता है, उसे खोजने अथवा उसकी तालाश के लिए गहराई में उतरना पड़ता है। उसने कई दफा शीशा पलट कर रखने का प्रयास किया, परंतु नाकामयाब ही रहा। इंसान चाह कर भी ख़ुद से झूठ नहीं बोल पाता, ख़ुद को तसल्ली दे सकता है बस। ख़ैर।

निजी अनुभवों का स्वभाव भी कितना अजीब है, मानो इनमें इतनी क्षमता हो कि आपकी 'आज की राय क्या होगी' और 'फैसले लेने की निर्भरता' भी इसे अपना आधार समझ बैठती है और आप बात-बात में नियमों का सरलीकरण करने लगते है। लेकिन इसमें गलती आपकी भी नहीं, ऐसा करने के पीछे व्यक्तिगत अनुभावों की भूमिका अधिक होती है; दूसरा ये भी कि इंसान का बर्ताव भी मनुष्य और उसका स्वभाव बदलने से बदलता है।

क्या आपके अच्छे-बुरे अनुभव आपसे आपके 'वास्तविक मैं" को हमेशा के लिए छीन लेने का सामर्थ्य रखते है? मैं समझता हूं, ऐसा स्थायी रूप में या हमेशा के लिए नहीं होता, इसकी काल-अवधि कुछ समय के लिए ज़रूर इंसान से उसके "मैं" को छीन सकती है, लेकिन 'मन की वास्तविक त्वचा' को भला कौन छोड़ पाता है कभी। ये आसान नहीं, हां उसके अपने मन के भीतर द्वंद्व ज़रूर हो सकता है; दूसरा ये भी मुमकिन है कि वो अपने 'वास्तविक मैं' और 'खुद पर थोपे गए मैं' के बीच पैदा होने वाले विरोधाभासों में फसकर भी रह जाए परंतु अंततः उसका 'वास्तविक अथवा मूल मैं' ही बाकी सभी प्रकार की बनावटों पर हावी होगा।

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21-05-23

Rahul Khandelwal


Note: The picture is taken by me.

"Your surroundings tell how diverse your consciousness is."


"Less heterogeneity is found in small states, which are more homogeneous in nature, and the same can be seen even in their single state-sponsored transport vehicle. The consciousness of the people living in such states which is also homogeneous in nature, is driven by more or less the same elements, which further become one of the deciding factors behind their choice of food, dress, topics for talk, and behavior."

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29-12-2023
Rahul Khandelwal 

Saturday, December 30, 2023

"सही ज्ञान के अभाव में, सफ़र का अंत दुखों की चोखट पर आकर ही होता है।"


''घटनाएं कभी भी समय देख कर दस्तक नहीं देती। हम अनिश्चितताओं से घिरे हुए है। आप योजनाएं बना सकते है लेकिन इस अधिकार से वंचित होकर कि योजनाएं सफल होंगी या असफल। नियंत्रण की सीमाओं का सही ज्ञान ना हो या उसका अभाव हो, तो सफ़र का अंत दुखों की चोखट पर आकर ही होता है।"

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07.07.23
Rahul Khandelwal

Note: The picture is taken by me.

Friday, December 29, 2023

उन्होंने कहा कि "सब्र की अहमियत" से कीमती मुझे कुछ नहीं लगता।


पिछली रात ऐसे गुज़रती चली गई मानो दिन गुज़रा हो। समय का अभाव था, पांच बजे सोकर छः बजे उठना था, मैं इंटरव्यू के लिए लेट नहीं होना चाहता था।

अच्छे दोस्त जीवन में कम होते है, तुम्हारा साथ रहा दोस्त, एक कागज़ पर दर्ज कर तुम्हारी दी हुई सहायता को मैंने दाहिनी पॉकेट में रख लिया हैं। मैं इसे भूलना नहीं चाहता था, इसलिए। "दर्ज किए हुए शब्द याद में तब्दील होकर समय–समय पर दस्तक देकर आपके जीवन में अहमियत रखने वाले लोग और वस्तुओं की याद दिलाते है, यादों और इतिहास के बिना इंसान की पहचान अधूरी है, मानो वो किसी नए शहर में एक अजनबी की तरह हो। खैर।"

जी.टी.बी. से साकेत का सफर कब गुज़रा, पता ही नहीं चला। मैं लगातार रीडिंग में व्यस्त था। तैयारी के बाद जब बाहर निकला तो दिल्ली हर रोज़ की तरह उतावली नज़र आई, सुबह और शाम के समय शहरों की गति तेज़ हो जाती है, हर कोई समय को पकड़ने की जद्दोजहद में दिखता हुआ नज़र आता है। "कभी–कभी हम सत्य को जानते हुए भी, उसे नकार देना चाहते है। हम जानते है कि हम नाकामयाब होंगे, परन्तु बहुत–सी मानवीय आदतें आपके भीतर घर कर चुकी होती है। इंसानी स्वभाव है, सत्य को स्वीकार कर चलना हर किसी के बस में नहीं।" मैं सोच ही रहा था कि सामने से आता हुआ ऑटो दिखाई पड़ा, मैंने रुकने के लिए हाथ आगे किया (बढ़ाया)।

–जे.एन.यूं. जाना है, कितना लेंगे भैया?

–सौ रुपए लगेगा, बैठ जाइए।

पिछले वाले ऑटो से हिसाब की तुलना कर, मैं बैठ गया। हम कुतुब मीनार रोड से होते हुए गुज़र रहे थे, और मैं इतिहास से। तभी अचानक बिना इजाज़त लिए इतिहास और मेरे बीच होने वाली वार्ता का उल्लंघन करते हुए ("आपके और आपके विचारों के बीच बाहरी उल्लंघन होना आपके बस में नहीं, एक कहानी टूटी कि दूसरी शुरू हो गई, ये भी हमारे बस में नहीं, कहानियों से सीखना हमारे बस में है") उन्होंने कहा कि मैं पिछले बीस सालों से इस रूट पर ऑटो चला रहा हूं लेकिन अब समय बदल गया है, पहले जैसा नहीं रहा। शायद जब बीस साल पहले किसी और का इंटरव्यू रहा होगा, तब भी इन्होंने उसे ऐसा ही कहा होगा कि "अब समय बदल गया है"।

"इतिहास गवाही देता है इस बात की कि हर दौर में पिछली पीढ़ी वाले नई पीढ़ी (मौजूदा पीढ़ी) वाले को देख दुःखी हो उठते है कि अब इंसान पहले जैसे नहीं रहे।" खैर। इस सफ़र का भी पता नहीं चला कि कब गुज़रा। अंतिम में मैं एक सवाल कर बैठा कि–

–बीती हुई उम्र में सीखे हुए अलग–अलग पाठ में सबसे अहम और ज़रूरी पाठ आपको क्या लगता है?

–उन्होंने कहा कि "सब्र की अहमियत" से कीमती मुझे कुछ नहीं लगता, हम सभी को इसके महत्व को समझना और सीखना चाहिए।

दो सेकंड आंख बंद और पांच सेकंड के मौन की वजह से पैदा हुई चुप्पी को तोड़ते हुए उन्होंने कहा कि ये लो हम पहुंच गए। साकेत से जे.एन.यू. का सफ़र कब गुज़रा, पता ही नहीं चला। मैं लगातार सुनने में व्यस्त था।

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01-04-23

Rahul Khandelwal

#Akshar_byRahul

Wednesday, December 27, 2023

"डोर को भी इस बात का एहसास अंततः हो ही जाता है कि किस रंग के मोती का चुनाव करना उसके लिए उचित है।"


“डोर का सिरा मोतियों को पिरोहने के लिए हर मकान की चौखट पर आकर नहीं रुकता। समय के साथ परखने और जीवन से जुड़े निजी अनुभवों के बाद उसे भी इस बात का एहसास अंततः हो ही जाता है कि किस रंग के मोती का चुनाव करना उसके लिए उचित है। ये प्रक्रिया बिना किसी बनावट और नियम के स्वतः ही होती है और साथ ही साथ समय की मांग भी करती है।”

इस पर विचार करने की ज़रूरत है कि क्या कैंसल कल्चर के नाम पर सभी रूढ़िबद्ध धारणाओं को खारिज किया जा सकता है? ऐसा करना कहां तक उचित है? ऐसा ज़रूरी नहीं है कि किसी अवधारणा को सैद्धांतिक रूप में समाप्त करने से, उसकी व्यवहारिकता भी समाप्त हो जाती है। रूढ़िबद्ध धारणाओं को हर बार किसी खांचे या वाद में बांधकर खारिज नहीं किया जा सकता। उनके असल महत्व को समझने के लिए, उन्हें उनके बनने की प्रक्रिया के संदर्भ में अधिक देखने की ज़रूरत होती है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि वास्तविक अनुभवों के आधार पर किए गए सरलीकरणों को कृत्रिम धारणाओं में तब्दील कर दिया गया हैं? प्रेमचंद ने सही कहा है कि संगत का आधार विचार, व्यवहार, सामाजिक-आर्थिक स्थिति भी होता है। क्या आप इसे भी खारिज कर सकते है?

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26-12-23
Rahul Khandelwal

Friday, December 15, 2023

काश वो समझ पाते कि दैवीय शक्ति का सहारा लेकर, विरोधाभासों को छिपाया नहीं जा सकता।

ब्रजभूम पर इतिहासकार इरफ़ान हबीब द्वारा लिखी किताब से मालूम पड़ा कि मुग़लकालीन भारत में ‘हैमलेट’ यानि की छोटे गांव को ‘नगला’ कहा जाता था। जिस इलाके से मैं ताल्लुकात रखता हूं, उस गांव के नाम के पीछे छिपे संदर्भ और इतिहास की जानकारी मुझे इस किताब को पढ़ने के दौरान हुई। कितनी ही दुनियाएं खाली पड़ी रहती है इंसान के जीवन के इर्द-गिर्द, लेकिन हमारी चेतना, जिसका निर्माण नाना प्रकार के कारणों से होता है, उसी एक स्वयं-निर्मित छोटी-सी दुनिया में ख़ुद को केंद्रित किए हुए रहती है और लगभग पूरा जीवन व्यतीत कर देती है। ध्यान से देखने का प्रयास करें तो मालूम पड़ता है कि कभी-कभी, कुछ हद तक व्यवस्थाएं भी इंसान की चेतना को नियंत्रण कर संकुचित बना देती है, इतना कि कई बार हम अपने सबसे नज़दीकी वस्तुओं से ‘क्या, क्यों और कैसे’, ये सब सवाल करने की जहमत ही नहीं उठाते। हमारी चेतना के निर्माण की प्रक्रिया ही ऐसी है कि शायद हम इन सवालों के महत्व को ज़रूरी समझते भी नहीं है।

ख़ैर, तो बात कुछ इस प्रकार है-

गांव नगला इमारती¹, पोस्ट ऑफिस मिलाप नगर, रुड़की। मैंने पिछले पच्चीस सालों में इस गांव के आस पास कई-से परिवर्तन होते हुए देखें है। जैसे, पहले जब आप ‘ढंडेरा’ नामक कस्बे से होते हुए इस गांव की ओर जाती हुई सड़क से होकर जाते थे, तो आप देखते थे कि सड़क के दोनों किनारों पर भारी संख्या में घने पेड़ मौजूद थे, दूर-दूर तक खेत-खलिहान आपको दिखाई देते थे। एक प्रकार से ऐसा प्रतीत होता था जैसे आप एक घने जंगल से होकर गुज़र रहे हो। आज, जब उसी सड़क से गुज़रता हूं तो काफी साफ़ दृष्टि से देख पाता हूं कि सड़क के किनारे दोनों ओर स्थित वो छोटा-सा जंगल, दूर-दूर तक फैले खेत और खलिहान अपनी सघनता को खो चुके है। वहां पर बहती हवा, जो अब कम दबाव के साथ चेहरे को छूती है, एक प्रकार की ख़ामोशी को साथ लिए इस बात की गवाही देती है कि उसने अपनी पहचान से जुड़ी विशेषताओं को अब कम कर दिया है। अगर मैं अपने गांव के आस-पास किसी क्षेत्र में कोई भारी परिवर्तन नहीं देख पाया हूं (या बहुत कम, ना के बराबर देख पाया हूं) तो वो है सामाजिक व्यवस्था का ढांचा।



शोध की कक्षाओं में हम सभी अनेकों वाद, वैचारिकी और दार्शनिक विचारधाराओं से ख़ुद को अवगत कराते है और इस प्रक्रिया के चलते कभी-कभी हम अपने अवचेतन में कहीं दूर दुबकी बैठी किसी घटना पर पुनर्विचार करने को भी विवश हो जाते हैं। घटनाएं-दुर्घटनाएं सभी के साथ घटती है। विचार और विमर्श का हिस्सा, उन्हें वह फ़र्क बनाता है, जो इस बात में निहित होता है कि आप कौन-से और कितने प्रकार के चश्मे से उसका मूल्यांकन करते है।

मैं वापस गांव पर लौटता हूं-

आज की तारीख़ में इस गांव की आबादी करीब छः से सात हज़ार है जिसमें मुसलमान आबादी बहुमत में है। यहां रहने वाले दोनों ही धर्म (हिंदू और मुसलमान) के लोगों में जातीय विविधता शुरू से ही मौजूद रही। जैसे, हिन्दू परिवारों में यहां पंडित, त्यागी, बढ़ई, गौर, कुम्हार, नाई, झीवर, दलित (भंगी, चमार) आदि जातियों के लोग यहां रहते है। इसी तरह से मुसलमानों में भी जातीय विविधता देखने को मिलती है।



मुझे एक किस्सा याद आता है कि झीवरों के परिवार में से एक सदस्य, सोनू, बागड़ यात्रा पर राजस्थान गए। मान्यता है कि इस यात्रा से लौटने के बाद घर पर बड़े भोज यानि की ‘कंदूरी’ का आयोजन किया जाता है, जिसके प्रसाद के लिए लोगों को निमंत्रण देने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती। सभी लोग अपनी इच्छा से या कहिए कि दैवीय डर के कारण भी इस तरह के आयोजनों में हिस्सा लेने पहुंच जाते है, फिर चाहे आयोजक किसी भी जातीय समूह से संबंध ही क्यूं ना रखता हो। और ऐसा हुआ भी। तो सुरेश त्यागी भी अपने दोनों पोतों को लेकर सोनू के घर पहुंचे, जिनके घर के एक कोने में पूजन भी चल रहा था। सभी लोग बारी-बारी से मत्था टेकते, आशीर्वाद लेते और कंदूरी का प्रसाद ग्रहण करते। त्यागी जी ने अपने दोनों पोतों से मत्था टेकने के लिए कहा, सोनू की माँ ने बिना झिझके दोनों बच्चों के सर पर आशीर्वाद के रूप में अपना हाथ फेरा। उसके बाद उन लोगों ने भी बाकी सभी लोगों के साथ मिलकर कंदूरी का प्रसाद ग्रहण किया। सच्चे मन से आशीर्वाद देने वाला व्यक्ति धारणाओं को साथ लेकर नहीं चलता, इस तरह के भाव बिना किसी पूर्वग्रहों और रूढ़िबद्ध धारणाओं की इजाज़त लिए बिना स्वतः ही भौतिक रूप में बदल जाया करते है।



वहीं दूसरी तरफ़ मुझे वो दूसरा किस्सा भी याद आता है जब त्यागी जी ने गांव में ‘शेरा वाली माता के रात्रि जागरण’ के अगले दिन भंडारे (भोज) का आयोजन किया जिसमें प्रसाद ग्रहण करने की व्यवस्था कुछ जातीय समुदाय के लोगों को छोड़कर बाकी सभी के लिए एक जगह पर की गई थी, जहां लोगों के बैठने के लिए कुर्सियां भी मौजूद थी। उन्हीं में से दो कुर्सियों पर बैठकर त्यागी जी के दोनों पोतें भी खाना खा रहे थे। दरवाज़ें से बाहर निकलने पर ध्यान गया तो साइड में देखा कि दूसरे बच्चों के साथ सोनू के दोनों बेटे चटाई पर बैठकर प्रसाद ग्रहण कर रहे थे। ये कैसी विडंबना है कि एक तरफ़ एक व्यक्ति ईश्वर की आस्था में या उसके डर से अपने बच्चों को आशीर्वाद दिलवाने किसी तथाकथित नीची जाति वाले व्यक्ति के यहां जाता है और दूसरी तरफ़ वही व्यक्ति अपने यहां ईश्वर की आस्था के नाम पर भोज का आयोजन कर किसी तथाकथित नीची जाति वाले व्यक्ति के बच्चों को अपने घर के भीतर दाख़िल भी नहीं होने देता।

काश! समाज में मौजूद इस तरह के लोग, समझ पाते कि दैवीय शक्ति का सहारा लेकर, विरोधाभासों को छिपाया नहीं जा सकता है।



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15-12-23
Rahul Khandelwal 

Notes & References: 
1) 1st picture shows Dhandhera/Laksar road heading towards my village, i.e., Nagla Imarti (as the same is mentioned in my blog as well).

2nd, 3rd & 4th picture is taken from internet.




Monday, November 20, 2023

"क्या हम बदलती मानवीय प्रवृत्तियों के पीछे छिपे संदर्भों को समझने में कामयाब हो पाएं है? हमें ध्यान रखने की ज़रूरत है कि निष्कर्षों की व्याख्या करते हुए 'संदर्भ और कारण की समझ' का अभाव आपको भीड़ की श्रृंखला का हिस्सा बना देता है।"


"अनेकों दोषों के लिए मानव प्रवृत्ति को दोषी ठहरा दिया जाता हैं, यह आसान है। परन्तु सवाल यह है कि क्या इस प्रवृत्ति का जन्म किसी एक मनुष्य की देन है या प्रत्येक मनुष्य अपने आस-पास के लोगों में पाई जाने वाली प्रवृत्ति से प्रभावित होकर इसी शृंखला का हिस्सा बन जाता है और तत्पश्चात् दोष का कारण ख़ुद-ब-ख़ुद मानव प्रवृत्ति हो जाता है? विचार कीजिए।"

"For many faults human tendency is blamed for, it is easy. But the question is whether the birth of this human tendency is a gift by one person or does a person become a part of this chain by getting influenced by the tendencies of people around him and thereafter does human tendency become the cause of the blame on its own? Think about it."

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21-12-2021

Rahul Khandelwal

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Note:

1. The picture is taken from internet.

Sunday, November 19, 2023

आपके द्वारा मानवीय विशेषताओं का वर्गीकरण ना करने का मतलब ये बिल्कुल नहीं कि समाज भी उनका वर्गीकरण नहीं करेगा। वो वर्गीकरण भी करेगा और तदानुसार आपके साथ व्यवहार भी करेगा। यहीं मानवीय व्यवहार का कटु सत्य है। इसे स्वीकारे और सतर्क रहें।


यह सब फिरसे सुनने के बाद उसे अधिक हैरानी नहीं हुई। (आख़िर वह भी बाकियों की तरह सबसे पहले एक इंसान है, तो कुछ क्षण थमकर उसने सोचा ज़रूर। लेकिन अपने प्रति लोगों का इस किस्म का व्यवहार देखकर, उसे ख़ास ताज्जुब नहीं हुआ, उसके लिए अब ये सब आम बन चुका था।) बस दुःख इस बात का है या यूं कहिए कि पछतावा है कि उसने फिरसे किसी पर विश्वास किया था। यहीं सब सोचते-सोचते, उसने आज फिरसे, अपनी आदत अनुसार एक सफ़ेद कागज़ और कलम का सहारा लिया (उठा लिया) और लिखने लगा-

“लोगों के सिवा भी सामाजिक परिवेश में बहुत कुछ निहित होता है जो उस बनते-बिगड़ते परिवेश में कारक का काम करता है। महत्वपूर्ण बात (विडंबना भी कह सकते है) यह है कि जिस किसी समाज में रहने वाले लोग तमाम तरह के अनुभव और अवलोकन के आधार पर तमाम प्रकार की धारणाओं, दृष्टिकोणों की व्याख्या कर, उन्हें जन्म देते है; बाद में वहीं, उसी समाज में रहने वाले लोग ख़ुद भी इन सबसे इस क़दर प्रभावित हो जाते है कि अपने ही द्वारा किए गए सरलीकरण को अंतिम सत्य मानने के लिए बाध्य हो जाते है और ये भूल जाते है कि ये सब कृत्रिम है। सरलीकरण का आधार बहुसंख्यक ज़रूर होता है, लेकिन उसी को अंतिम सच मान लेना मूर्खता करने के समान है क्योंकि उसके आधार में सब कुछ या हर कोई शामिल नहीं होता।"

यही सब को लिखते-लिखते, उसे, अतीत में बीती उन घटनाओं ने घेर लिया जो उसके लेखन को बाकी लेखकों की तरह आधार प्रदान करती है। उसने गौर से ध्यान दिया तो बात और भी स्पष्ट होती चली गई, जो कुछ इस प्रकार थी और वो फिरसे सोचने लगा-

यह सब उसके लिए प्राकृतिक प्रक्रिया है कि जब वो किसी नए पड़ाव का हिस्सा बनता है, तो नए लोगों से भी मिलना होता है, ये ज़ाहिर-सी बात है। और उसी प्रक्रिया में समय गुज़रने के साथ, वो एक-दूसरे से परिचित होकर परत दर परत खुलना शुरू कर देता है। अपनी विशेषताओं से संबंधित जानकारियां साझा करते हुए कुछ लोग उन्हें अपनी “ताक़त और कमज़ोरी” के वर्गीकरण में बांटकर नहीं बताते या अगर अनजाने में बता भी देते है तो उन्हें यह उम्मीद नहीं होती कि इसका फ़ायदा भी उठाया जा सकता है। क्योंकि विशेषताओं का वर्गीकरण अगर आप नहीं करते है (या अगर अनजाने में कर भी देते है), तो समाज में रहने वाले लोग (ख़ासतौर से वे लोग, जो जानकारियां हासिल करते हुए, आपसे, उन्हें किसी दूसरे के साथ ना साझा करने का वायदा भी करते है) उनका वर्गीकरण जानबूझकर करते है और तदानुसार आपके साथ व्यवहार भी करते है। मनुष्य व्यवहार का एक कटु सत्य यह भी है। इसे स्वीकारे और सतर्क रहें।

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19-11-2023

Rahul Khandelwal


Tuesday, November 14, 2023

हम धीरे-धीरे 'मजबूर होते हुए मनुष्यों की श्रृंखला' का हिस्सा बनते जा रहे है।

 


"जिन छोटे गांव और कस्बों को, वहां रहने वाले लोगों को हम छोटी निगाह से देखकर आंकते है और तरह-तरह की संज्ञाएं देते है, उन दूर-दराज स्थित गांव में जब कभी-भी जाता हूं तो लगता है पर्यावरण की सुरक्षा और उसके ख्याल को लेकर वहां रहने वाला समाज और लोग हमसे कई ज़्यादा अधिक सहज है और उससे जुड़ी गंभीर समस्याओं को हमसे बेहतर समझते है। मैंने कई बार देखा है और महसूस किया है कि गंभीर मुद्दों को लेकर ग्रामीण समाज अपने मन में कहीं दूर, भीतर, अपने अवचेतन मन में एक प्रकार के डर को जल्द ही स्थान दे देता है, जिसका जाने-अनजाने में सकारात्मक परिणाम ही होता है। इस तरह का व्यवहार हमें शहरों में रहने वाले लोगों में कम देखने को मिलता है। जिस प्रकार हम उन तमाम तरह के भेदभाव को सामने घटते हुए देखने के आदी इस हद तक हो गए है कि बस एक चुप्पी साधकर और शांत रहकर उसे स्वीकार लेते है, उसी प्रकार हम पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं को देखकर भी अपने मौन को दर्ज करने के सिवा और कुछ नहीं कर सकते। हम धीरे-धीरे 'मजबूर होते हुए मनुष्यों की श्रृंखला' का हिस्सा बनते जा रहे है। यह बेहद दुखद है।"

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14-11-2023

Rahul Khandelwal 

#Akshar_byRahul

Sunday, November 5, 2023

चीखते सवाल

 


अनसुनी गुहार, जिसे सुनकर, नज़रंदाज़ कर देने की हमें आदत हो गई है।

"अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आपको कई सारे माध्यम देती है मन की परतों के नीचे दबे अलग-अलग ख़्यालों को व्यक्त करने की। मैं लेखन का चुनाव कर लेता हूं। इस कविता में हज़ारों ज़िंदगियां खो जाने के कारणों की तलाश करती, हज़ारों नन्हीं ज़ुबानों को व्यक्त करने की एक छोटी से कोशिश की गई है, जो उन तमाम समस्याओं को जिनके जनक वो ख़ुद नहीं होते है, लेकिन उनसे होने वाले परिणामों का भागीदार ना चाहते हुए भी वो ज़रूर बन जाते है। और जब अपनी उम्र के अनुसार छोटे स्तर के ज्ञान के आधार पर समस्याओं से होने वाली मुश्किलों को झेलते हुए उसके होने का कारण सवालों के रूप में पूछते है, तो बड़े स्तर वाले समूह ऐसी स्थिति में उनके समक्ष, अपने स्तर के ज्ञान के आधार पर इकट्ठा किए गए कारणों को जवाब के रूप में पेश कर देते है।"

उसका इतिहास, राजनीति, भूगोल, धर्म और समाज

उसके अपने

और नज़दीक के

दस मकानों तक सीमित है


जहां उसने

अपने और औरों के साथ

प्रेम, आदर और सहज भाव से

रहना सीखा है


इस उम्र में भी

वो अपने “इस छोटे-से देश” में

जिस किसी को जानता(ती) है

हर किसी के प्रति

ज़िम्मेदारी का भाव रखता है


वो अपने समर्पण को

मोल-भाव कर

तराज़ू में नहीं तोलता(ती)

व्यसकों की तरह


उसे मालूम नहीं था

कि उसके अनुसार परिभाषित देश को

उसमें रहने वाले

बेकसूर उसके अपनों को

युद्ध के दौरान

जाने या अनजाने में

तबाह किया जा सकता है


और जब वो असंख्य लाशों के बीच

अपनी मां, पिता, भाई, बहन और दादी के

ना होने का कारण पूछता(ती) है

तो जवाब में

थमा दिया जाता है

उसके नन्हें हाथों में

देश का इतिहास, राजनीति, भूगोल, धर्म और समाज


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05-11-23

Rahul Khandelwal

Click on this link to listen my poem on YouTube.

Published in "KRITYA Poetry Journals." Click on this link and scroll down to the bottom.


Notes:

1. The poem is dedicated to all those innocent  children of both sides who are dying and losing their loved ones in Israel-Palestine conflict.

2. The picture is taken from internet.

उपेक्षा

रेत के कण ज़मीन से उठकर हथेली को छूने लगते है अतीत की छुअन वर्तमान में अनुभूति बन जाती है होने वाली सिरहन याद दिलाती है कहती है चीखकर फिर— ...