Monday, August 17, 2026

सिहर जाता हूँ यह सोचकर भी कि मनुष्य याद करना भी भूल सकता है। दावे ज़ाहिर करने से हमेशा दूर रहा लेकिन यह कह सकता हूँ कि कम से कम एक जीवन के लिए तो स्मृतियाँ अमर नहीं रहती। हैरत है कि या डरता हूँ अगर जो ज़हन में भी आ जाएं कि समय के एक अंतराल की कुछ स्मृतियाँ सूख जाती है। कभी-कभी अतीत की चौखट लांघते ही वो अपना मालूम नहीं पड़ता कि जैसे अजनबी हो। क्या तुम्हारे भीतर कोई आवाज़ चीखती नहीं यह जानकर? तुम्हारे सच को अतीत की जिस याद में बनते हुए मैंने देखा था, वर्तमान की चौखट पर वो मेरे लिए कई अनबुझे सवाल छोड़ जाता है। मैं किस पर यकीन करूँ—तुम्हारे अतीत पर या वर्तमान पर? पर्दा मेरी आँखों पर डला था या नकाब तुम्हारे चेहरे पर?

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