दो तरह की भाँप उठती है
कहीं दूर घोर अंधेरे में
जहाँ की तह में पहुंचने के लिए
बाहरी और आंतरिक अन्तर्सम्बन्धों के संघर्ष से गुज़र रहा हूँ
ध्यान की उस स्थिति ने दोनों का एक ही पता दिया है
मैंने दोहरा-दोहरा कर पूछा फिर भी
मुझे शक था
लेकिन मैं गलत साबित हुआ—पता एक ही था
एक भांप है इंद्रियों से उठती है
बेड़ियाँ अधिक है उसमें अपवित्र तृप्ति का मुखौटा ओढ़े
वो आज़ाद भी करती है और बाँधती भी है
गुहार—मैं बंधना नहीं चाहता
ये रास्ता अभिशप्त है दुःख भोगने के लिए
दूसरी का रास्ता शून्य की ओर ले जाता है
स्थिरता है वहाँ और सब कुछ पाख भी
दुःख से परे और सुख से भी
लेकिन फिर भी आँसू बहते चले जाते है
सत्य ज़ोर-ज़ोर से पुकारता है
मेरे कानों को वो चीख लगातार सुनाई देती है
मैं उसे नज़रअंदाज़ किये जा रहा हूँ
अधार्मिक तृप्ति अभिशप्त है जीवित मृत्यु के लिए
मुझे ऐसी मृत्यु नहीं चाहिए
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27.07.2026
Rahul Khandelwal
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