Monday, August 17, 2026

डायलेक्टिक्स

दो तरह की भाँप उठती है

कहीं दूर घोर अंधेरे में

जहाँ की तह में पहुंचने के लिए

बाहरी और आंतरिक अन्तर्सम्बन्धों के संघर्ष से गुज़र रहा हूँ 

ध्यान की उस स्थिति ने दोनों का एक ही पता दिया है

मैंने दोहरा-दोहरा कर पूछा फिर भी

मुझे शक था

लेकिन मैं गलत साबित हुआ—पता एक ही था


एक भांप है इंद्रियों से उठती है

बेड़ियाँ अधिक है उसमें अपवित्र तृप्ति का मुखौटा ओढ़े

वो आज़ाद भी करती है और बाँधती भी है

गुहार—मैं बंधना नहीं चाहता

ये रास्ता अभिशप्त है दुःख भोगने के लिए


दूसरी का रास्ता शून्य की ओर ले जाता है

स्थिरता है वहाँ और सब कुछ पाख भी 

दुःख से परे और सुख से भी

लेकिन फिर भी आँसू बहते चले जाते है

सत्य ज़ोर-ज़ोर से पुकारता है

मेरे कानों को वो चीख लगातार सुनाई देती है

मैं उसे नज़रअंदाज़ किये जा रहा हूँ

अधार्मिक तृप्ति अभिशप्त है जीवित मृत्यु के लिए

मुझे ऐसी मृत्यु नहीं चाहिए

________________

27.07.2026

Rahul Khandelwal

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