रेत जब फिसल रही थी
क्या छुअन किसी और की थी?
गुज़रे हुए वक्त में
तुम नहीं बीत रहे थे?
समय किसी का मोहताज नहीं
बशर्ते कि तुम्हें ये याद रहे—
उसके संचालक तुम नहीं कोई और है
'शायद' वो ख़ुद ही है
(दावे से बचता हूँ)
यह एहसास अतीत की रेखा को कभी मिटाता नहीं
बिना उसके मुमकिन नहीं जान पाना—
मनुष्य के लिए
अस्तित्व, पहचान, और चेतना को
ज़मीन पर पड़े रेत के कण तुम्हारे अपने ही हैं
बचाया जा सकता है धूमिल होने से उन्हें
और बच सकता है तुम्हारा संपूर्ण "मैं"
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15.08.2026 | Rahul Khandelwal
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